होली

होली का यह मंगल –पर्व ,क्रांति बनकर आया है.

वैर –द्वेष अभिमान भूलाकर, हम सब में समाया है.

निराशा –हताशा थकान मिटाकर, तन-मन को हर्षाया है .

हास –परिहास में डूब –डूबकर, मस्ती का रंग जमाया है .

निर्मल प्रेम से भरी फुहारें , मन को स्वच्छ बनाया है.

चटख रंग की शोख छठायें ,गली –गली में छाया है.

कोइ भी जन छूट ना पाए, ऐसा रंग सजाया है .

प्रेम –प्रेम बस प्रेम का रंग हो, हर्ष –उल्लास जगाया है.

गूँज उठा है स्वर  पुराना,  बुरा न मानों होली आया है .

3 Comments

  1. vinay 23/03/2013
  2. reena maurya 27/03/2013
  3. Madan Mohan sxena 28/03/2013

Leave a Reply