नारी चेतना

जब तक थी वो घर के अन्दर,
दुनिया कोसती रहती अक्सर ,
आज दहलीज के पार है ,
करती सपने साकार है .
जमीन अपनी तलाशती हुई,
साहस का परिचय देती हुई,
हर -क्षेत्र में महिला छाई आज,
उनसे जाग्रत हुई समाज .
पराबलंबन छोड़ चुकी है ,
तन और मन को जोड़ चुकी है,
नारी है सुन्दरतम रचना ,
ना को ई क्षोभ ,ना को ई छलना.
जिस घर में नारी का पूजन,
उस घर को रब करता वंदन,
अहं छोड़ कर उसे सजाये,
घर अपना जन्नत बनाये .

भारती दास .

2 Comments

  1. Mahendra Gupta 22/03/2013
  2. Sujeet Kumar 22/03/2013

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