रंगों भरी दुनिया के रंग ही खो गये

ज़िन्दगी हर लम्हा हमें ख़ुशी नहीं देती,
हर चमकती हुई चीज रोशनी नहीं देती,
रब से तो हमने भी बहुत कुछ माँगा ,
पर किस्मत ना हो, तो ये जमी भी नहीं देती।।

ज़िन्दगी से कुछ माँगा तो वो मन्नत बन गयी,
जब उसने खुद सब दिया तो वो जन्नत बन गयी,
खुद की ज़िन्दगी में इतनी उलघ गयी मैं की भूल ही गयी,
की कब मन्नत मेरी जन्नत और जन्नत मेरी मन्नत बन गयी।।

खुद की ज़िन्दगी में वो सुकून कहाँ से लाऊं ,
जो रूठ गए है मुघसे उन्हें अब कैसे मनाऊं ,
अब हर लम्हा यही डर रहता है मुघे की,
अपनी ज़िन्दगी के अकेलेपन में कहीं खो न जाऊं।।

अपनी ज़िन्दगी का हर लम्हा अंजाना लगता है,
खुद की ख़ुशी से खुद ही बेगाना लगता है,
यहाँ हर मोड़ पे धोखे  ही धोखे हैं,
और लोग कहते हैं की उन्हें अपना सा ये ज़माना लगता है।।

हर फरेब को करीब से देखा है मैंने,
ज़िन्दगी को ही पासा बना के फेका है मैंने,
खुद की ज़िन्दगी को इस कविता में बयां किया मैंने,
और लोगों ने कहा की ये तो पहले भी कहीं देखा है मैंने।।

मैं तो अब भी वही हूँ बस अपने ही खो गए,
एक दुसरे से बेगाने होके आज सब सो गए,
रंगों भरी ये दुनिया थी ये तो सुना था,
लेकिन आज उस दुनिया के रंग ही कहीं खो गये।।

5 Comments

  1. Vikrant 21/03/2013
  2. Kumar Gaurav 21/03/2013
  3. Onkar Kedia 23/03/2013
  4. अंजु(अनु) 23/03/2013
  5. अंजु(अनु) 23/03/2013

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