ऐसी जोगन मैं हो गई !

करवट बदल बदल कर,

उनींदी रातें गुजारती रही !

खोकर इश्क की बाहों में,

अकेले में मुस्कुराती रही !

कभी खामोश रहकर,

कभी लफ्जो का साथ लेकर,

हाल-ए-दिल बताती रही !

 

थम थम कर ये सासें मेरी,

नाम तुम्हारा लेती रही !

है इश्क तुमसे बेइंतेहा,

हर पल यही कहती रही !

 

शामिल हुए जब से तुम मुझमे,

बेताबी धडकनों की बढती रही !

बेकरारी बढ़ा कर मेरी,

ये शब मुझे छेडती रही !

है इश्क कितना मुझे तुमसे,

यही सवाल पूछती रही !

 

अलफ़ाज़ जब ये कम पड़ गए,

मैं कुछ भी उन्हें न कह सकी !

मेरा मुझमे कुछ रहा ही नहीं,

जब से तुम में मैं मिल गई !

रूह तक में भी तुम ही मिले,

ऐसी जोगन मैं हो गई !

तेरे इश्क में फना होकर,

खुद से जुदा मैं हो गई !

-श्रेया आनंद

(21st Jan 2013)

2 Comments

  1. M. K. Giri 26/03/2013
    • Shreya Anand Shreya Anand 15/04/2013

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