झूंठ के सर पर सुनहरा ताज है

झूंठ के सर पर सुनहरा ताज है

आजकल सच बोलना भी पाप है ॥

है कलंकित ही निरा इतिहास जिनका

उनके हाथों में कुंवारी लाज है ॥

हर गली मे मुजरिमो का दबदबा

अब शहर में जिन्दगी अभिशाप है ॥

रह गया दर्पण ठगा सा देखकर

असली चेहरा किस कदर खूखांर है॥

न्याय की देहलीज पर भी है लिखा

अर्थ ही अबतो यंहा सरताज है ॥

ये अदा उनकी निराली है ज्ररा

ओंठ पर मुस्कान दिल मे बाज है ॥

काट दी  गर्दन सरे बाजार ही

आजकल यह प्यार का अन्दाज है॥

“दास ” अब तो हर तरफ आंतक है

नींद मे गहरी मगर सरकार है॥

शिवचरन दास

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