४२३७. इक बार कोई लड़की नज़रों में समाई थी

४२३७. इक बार कोई लड़की नज़रों में समाई थी

 

इक बार कोई लड़की नज़रों में समाई थी

हम भी मुस्काए थे वो भी मुस्काई थी

 

इक लमहे में कौंधी थी बिजली अंबर से

मेरे आगे जैसे दरपेश खुदाई थी

 

दिल की धड़कन बढ़ गई, देखा ये तसव्वुर में

मेरे ज़ानिब वो ज्यों कुछ-कुछ शरमाई थी

 

सपने तो सपने हैं, ख़्वाबों की हकीकत क्या

ये बात तज़ुर्बे ने हमको समझाई थी

 

दिल जीत लिया उसका थी ख़लिश हमें गफ़लत

मुस्कान थी जो लब पे, दिल से न आई थी.

 

— महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

१८ जनवरी २०१३

 

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