नारी के प्रति मानव के कर्तब्य और फ़र्ज़ …

नारी के प्रति मानव के कर्तब्य और फ़र्ज़ …
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हर चीज़ यहाँ पे बिखरी है,दिखती है लोगो को सिर्फ अपनी अपनी
जिन लोगों को पता है सब , उनको सिर्फ परवाह है अपनी अपनी
महिलाओं की स्थिति नाजुक हो रही है इस पुरुष प्रधान समाज में ,
बिन उनके विकास की गाथा सिर्फ पन्नो पे होगी
जानते है सब लोग यहाँ , फिर क्यों पड़ी है सिर्फ लोगों को अपनी अपनी
नहीं चाहते है हम , कोई दुःख का भागी हो ,
हर हवाँ में ऐसी ताकत को जिससे बदले समाज की छवि
मिले महिलाओं को उनका हक , उनके हक से भी ज्यादा
किस महूरत का इंतजार हमें है अब जगने को ,
कुछ उनके लिए करने का वक्त है अब आया ,
हाथे खुली हुए है सबकी ,बस अब हाथ बढ़ा दो अपनी अपनी
उनके होठों से मुस्कान जब आती है कभी कभी
हर किसी को दिखती है उनकी ऐसी तैसी हँसी खुशी
जब हर पल उनके नयनो से अश्रु का होता है प्रवाह
क्यों कुछ दिखता नहीं किसी को ,और क्यों मर जाती है यहाँ पे मानवता सबकी अपनी अपनी
जब वो अपने पेट के लिए है निकलती है घर से बाहर
क्यों टिक जाती हैं सबकी नजरे उसके ऊपर ,
कुछ पल में ही सिलसिला शुरू होता है उसे अपना बनाने का ,
दर्द का दामन जब फैलाती है वो सबके सामने अपना ,
मुह फिर जाती है सबकी जैसे -तैसे , इतर बितर
पल भर पहले उसे अपना बनाने की जो दिल में उठी थी लहरे सबकी
पल हर में ही आखिर क्यों सबको पड़ जाती है अपनी अपनी …
दर्द की भागी वो ही क्यों , क्या उसका है गुनाह यहाँ
बिन गलती के सजा भुगते का कैसा है न्याय यहाँ
बिन उनके अस्तित्व अधूरी है यहाँ पे हर प्राणी की
हाथ नहीं जब बढ सकते उनके उद्धार के लिए , आखिर रब ने दिया किसलिए सबको हाथ अपनी अपनी
उनके समुचित सम्मान के लिए करना है अब संघर्ष यहाँ
होके संघ में शामिल , लगा दो बस आग यहाँ
एक फ़र्ज़ नहीं एक क़र्ज़ भी ये है , जिसको है पूरा करना
न सोच की तुम क्यों साथ चलो, अब ये बात नहीं है अपनी अपनी
क्यों खोमोशी धारण करके बुद्धिजीवी है बैठे यहाँ
क्या इल्म ज्योति बुझ रहा है लोगों के ह्रदय से
कोई कथनी से कोई लिखनी से बातें करते है उनकी
ये तो सिर्फ और सिर्फ बात है अपनी अपनी
बिन करनी के , क्या वजूद है लिखनी और कथनी का
जब तक हम ऊपर न उठे , न समझे की ये बात नहीं है सिर्फ अपनी अपनी
खुदगर्ज़ होके क्या हासिल होगा आपको ,
कुछ पल के लिए कुछ हासिल होगा , पर न होगा वो स्थाई
बिन उनकी सेवा किये उनके लिए कुछ सत्कर्म किये,हासिल न होगा रब आपको
जब नहीं बचेगा कुछ खोने को , पाने की उम्मीद ख़तम
ख़तम हो जायेगा सब कुछ यहाँ . फिर रोना सब पकड़ पकड़ के अपनी अपनी
सिद्दत से सोचे जरा यहाँ , क्या मतलब है होगा जीने का
जब हर लफ्ज होगी खामोश और हर ख़ामोशी येही कहेगी कहा गई अपनी अपनी
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♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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