बिना नारी, दुनिया बेकार है सारी

मेरा मानना इतना ही है बस
नारी बिना, दुनिया बेकार है सारी
यकीन ना हो तो एक बार सोचो
पाओगे तुम खुद को भी इसके आभारी
ब्रम्हांड में देखो तो,
जीवन का आधार है नारी
बहते पानी में देखो तो,
गंगा की धार है नारी
महाभारत के भूमि पर,
गीता का सार है नारी
कहीं लक्ष्मी-बाई बन कर ,
देश पे मिटने को तैयार है नारी
कहीं एक कमरे को,
घर बनाने वाली परिवार है नारी
कहीं पिता के आँगन की,
चंचल बहार है नारी
कहीं बहु के रूप में,
घर का श्रींगार है नारी
कहीं पति के दर्द बाटती,
मरहम का आहार है नारी
कहीं बच्चों के बहते,
अश्कों की पुकार है नारी
कहीं अपने सपूत की रछा हेतु,
तनी हुई तलवार है नारी
सोचो तो पृथ्वी पर,
जीवन-आदर्शों का संस्कार है नारी
आज की दुनिया में फिर भी,
जाने क्यों इतनी लाचार है नारी
क्यों कहते हैं लोग अब भी,
बेटी के रूप में हमें अस्वीकार है नारी?
क्यों किसी की सोच में आज भी,
माता पिता पर भार है नारी?
क्यों नहीं ये समझता कोई
लक्ष्मी, दुर्गा का अवतार है नारी
मेरा मानना इतना ही है बस
नारी बिना, दुनिया बेकार है सारी – प्रीती श्रीवास्तव

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