मसरूक हो गया दिल अपना रास्ते पे चलते चलते

जानते है आप सब भी क्या गलत है और क्या सही ,फिर भी जब इश्क का भूत सर चढ़ जाता है तो अपने बेगाने हो जाते है सही गलत की पहचान करना तो दूर हम अपने वजूद तक को भूल जाते है , माँ की गोद में सर रख के बड़ा हुए है हम लेकिन अब चार दिन की दीवानगी के सामने माँ का प्यार फीका हो जाता है क्यों ?
प्रेम की परिभाषा ही मानों बदल गई हो
*****************************************
मैंने एक झलक किसी को देखा और उनके दीवाने होते चले गए
कुछ पल का मिलन था वो फिर न जाने कहा चली गई
सिर्फ हमारे पास था तो उनका नज़राना. और बस
इन कमबख्त नज़रों में उनके आसियाना बनते चले गए
कोई और दिखता, तो हमें कुछ दिखता नहीं
मसरूक हो गया दिल अपना रास्ते पे चलते चलते
वो एक बादल थी हम थे आजाद परिंदे
उनकी बाँहों पे सोने के ख्वाबों में हम खोते चले गए ..
दम -कदम बन चुकी थी वो अपनी , दम-ख़म खो चुके थे हम
बस हर जगह उनकी सूरत की मूरत बनते चले गए …
निसुख हो गए हम उनकी यादों को लेकर
हम उनके पास जाने में थक गए और वो हमसे दूर चलते गए
किसी को पाने की ललक ऐसी होती है हमें नहीं पाता था पहले
एक को हासिल करने के चक्कर में सब कुछ खोते चले गए
ये दिल नादाँ था , ये दिल नादाँ था जो पल भर में हार गया
हम खुद को समझा भी रहे थे और उनके बारे में सोच भी रहे थे
न जाने क्या हो गया हम खुद से कैसे दूर चले गए ..
हम जो कल थे आज वो न रहे ,
हर वक्त उनकी यादों में डूबा रहना मानो फितरत सी हो गई
हर पल अब वर्ष हो गया अपने लिए ,
बढ रही थी धड़कने , बेचैन हो गए थे हम
सागर की उर्मि, वो सूरज की रश्मि
सब कुछ रूठा रूठा सा लगता था अब ,
वक्त बीत रहा था ,भटक चुके थे हम ,,
एक पल में सब कुछ हसीं हो गया
वो मिली यू खुबसूरत मुस्कराहट के साथ , जब हम डूबने के करीब थे
हाथ बढाया उसने हाथ मेरा पकड़ने के लिए
अब शायद बचा नहीं था कुछ खोने को उसके लिए
इसलिए हमने उनका हाथ न थामा और डूबते चले गए …
अफसोस के शिकार थे हम , सिर्फ एक प्रश्न पूछा हमने
२० साल के प्यार में क्या कमी रह गई
जो समझदार होते हुए भी नासमझ होते चले गए …
कुछ पल का जीवन था अपना अब , बैठ चुके थे सागर के आगोश में
एक लहर का झोका आया और हम उसी में सिमटते चले गए ,….
सिमटते चले गए ,सिमटते चले गए, सिमटते चले गए
*****************************************
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

One Response

  1. rameshwar 11/03/2013

Leave a Reply