शो पीस

तुम्हारे ख़तों से
अनगिनत शब्दों को चुराकर
मैंने लिखी है
एक किताब

तुम्हारे ओठों पर
सदा विराजती मुस्कान
और आंखों में छाये
भावों को लेकर
बनाई है एक पेंटिंग

गिरते को थामने बढ़ी
तुम्हारी बांह
अपंग को गति देनेवाले
तुम्हारे पांव
और हमेशा सृजन करती
तुम्हारी काया को लेकर
मैंने बनाई है एक मूरत

जब तुम नहीं थी
तब ये सब
मेरे ड्राइंगरूम में
शो पीस की तरह चमकते थे
आज तुम हो
तो ये सब
किसी तिलस्मी दुनिया
के अजायबघर में क़ैद हैं।

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