वेदनाओं के चरम में

वेदनाओं के चरम में,
जो हृदय से स्वर उभरते,
काव्य बन कर के धरा में,
वे अमर हो कर विचरते।।

प्रीत जग में है जरा सी,
भावना हो रही बासी।
पर हृदय की पीर साँची,
गीत में गुंथ मुस्कुराती।
जब हृदय की वेदना से,
शब्द झर-झर के निकलते।
काव्य बन कर के धरा में,
वे अमर हो कर विचरते।।1।।

हो सघन कितना अँधेरा,
तिमिर ने भी मार्ग घेरा।
गीत पथ ऐसे दिखायें,
मार्ग में जैसे सवेरा।
छंद के इन बन्धनों में,
चेतना के स्वर मुखरते।
काव्य बन कर के धरा में,
वे अमर हो कर विचरते।।2।।

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