सिर्फ़ तुम्हारे लिए

सिले-सिले होठों से
कैसे कहूं
कि मैं तुम्हे चाहता हूं

मुंदी-मुंदी आंखों से
कैसे बोलूं
कि तुम कितनी सुन्दर हो

बंधे-बंधे हाथों से
तुम्हें कैसे बांधूं
कि तुम वही सब्ज़परी हो
जो मेरे सपनों में
हर पूर्णिमा की रात
चांदनी के रथ पर
आकाश से उतरती हो

रुके-रुके पांवों से
तुम्हें कैसे रोकूं
क्योंकि तुम नदी की तरह
मेरी बगल से रोज़ बहती हो
खुला है
मेरे हृदय का कपाट
झांक कर देखो
एक मंदिर सा बना है अन्दर
तुम्हारे लिये
सिर्फ़ तुम्हारे लिये।

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