गम की आह जलाती है ,हमको अंदर ही अन्दर

गम की आह जलाती है ,हमको अंदर ही अन्दर
क्यों अपंग बनाया रब ने उनको , कितने अच्छे थे वो पहले
इस ह्रदय विदारक घटना से हम दुःख होते है ,मन ही मन के अन्दर
क्या कोई ऐसा तिलिस्म है जो बदले दे सबकी नियति
ना ही रब से , ना ही जन , हम पूछते है खुद से अन्दर ही अन्दर
क्यों ऐसी कमियां डाली यहाँ पे लोगों के अन्दर ,
जिससे उपजा लोगो में सिर्फ बेबसी और लाचारी
है ऐसे अनगिनत प्रश्न यहाँ दिल के अन्दर
जो दर्द दिया कुछ पल के लिए उससे किसी को कष्ट नहीं
थोड़े से दर्द से सिमट गई उनकी दुनिया खुद के अन्दर
हर वक़्त जो चलते है सडकों पे लकड़ी के पल्लों पे
जिसमे होते है घिरनी जैसे ,पहिये छोटे छोटे
इसपे आने से पहले उनके भी थे अरमान यहाँ .
जब देखा सड़को पे लोगो को अरमानों से लड़ते भिड़ते
खुद के अरमान सुलगने लगे, अन्दर ही अन्दर
पल भर में कितना छोटा हो जाता है जीव यहाँ
नहीं पता ऐसी घटना ज्ञानी , विज्ञानी और मुनियों को
कल तक जलता चिराग था उनके दिल के अन्दर ,
दिव्य ज्योति निकलती थी जो करती थी सबको उज्ज्वल
चिराग हुआ है दूर अब ,चिंगारी के है मोहताज यहाँ
बस आशा और निराशा ढूढ़ रहे है अपने अन्दर
मै “शिव कुमार सिंह” न ही समर्थक हु रब का , और ना ही हु विरोधी
बस प्रश्न के थैले में से एक प्रश्न का उत्तर चाहू रब से
नहीं भेदभाव की उसके , फिर क्यों घुट घुट के मर रहे है वो ,अपने ही अन्दर

 

♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

मुख्य रूप से ये कविता सड़क में चलते हुए उन लोगो की दास्तान को प्रकट करने की कोशिश कर रही है जो बिन पाव के पटरे पे चलते है

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