गीत मेरे

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,

वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,

छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,

और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,

कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब,

फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब,

जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण,

गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।

जग विभामय न तो काली रात मेरी,

मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी,

यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण,

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।

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