कोरे कैनवस की मोनालिसा

बंद पलकों से
दे रहा इशारे
स्वप्न रचने
तुम्हारी उनींदी आंखों में

अनचली
थमी-थमी सी
मेरी सांसें
बजाकर बांसुरी
नींद में उड़ाती तुम्हें

मौन का
है संवाद मेरा
खोलती
खिड़की तुम्हारी
एक झोंका है
हवा का
द्वार पर
सांकल बजाता
एक खुशबू
बह रही
बेचैन है

अनछुये अहसास
मौसम के
पुलक रहे
शांत चेहरे पर
सुलग रहे
शून्य भाव

एक क़तरा
रोशनी का अन्दर
आने तो दो
एक क़तरा
रोशनी का
बाहर निकल
जाने तो दो

मेघ के स्वर
बिखर गये
अनसुने गीत
गाने तो दो

तुम बनो
इतिहास सृजन का
गह रहा हूं
इसलिये
कुछ शब्द ऐसे
ढालने
ग़ज़ल में
लिख रहा हूं
कुछ नज़्म ऐसे

बिना रंगों की
तूलिका
फैला रहा हूं मैं
कोरे कैनवस पर
‘मोनालिसा’
बना रहा हूँ मैं।

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