एक अनाम दुनिया की प्रणय-कथा

हम सब ने बनाई है
अपरिचित शब्दों की
एक अनाम दुनिया
जहां नागफ़नी के कांटेदार जंगल में
कभी-कभी रसवंती के बेर उग आते हैं
कभी बेर को पाने की हवस में
कांटों की नोंक पर लहू लबरेज होते हैं
पर लहू में बेर की मिठास जारी रहती है

हम सब ने मिलकर
सात बार बसंत बोये हैं
सात बार पतझड़ की
उदास शुष्क दोपहर की
जल्लादी उमस से तार-तार हुए हैं हम

सात सावन को बहाया है हमने
उसकी ठंडी-ठंडी बूंदों को
मोतियों की तरह पिरो कर
अपने अन्तःपुर को सजाया है हमने

सात शरद की सुबह और शाम
हम सब ने मिलकर
बनाई हैं कुछ मूर्तियां, कुछ पेंटिंग
अजन्ता, एलोरा की मानिंद

कुछ कबूतर उड़ाये हैं
कछुये और खरगोश को भी
दौड़ाया है इन ॠतुओं में हमने
हम सब ने मिलकर साथ-साथ
पलकों की घूंघट में
अनबोलते अक्षरों के महावर सजाए हैं
जो बिना अर्थ बताये टूट कर बह गये
सूखती गंगा की विलोपित होती धार की तरह

इन्हीं हाथों से हमने चुने
कुछ फूल, कुछ रंग
बनाये कुछ गजरे
पर किसे पता था कि
गजरों से भी चोट लगती है
चोट की मुस्कुराहट का
अन्दाज़ यहां अनोखा था
पेशानी पर मकड़जाल नहीं
लटों की लंपटता जारी थी

मौसम लुकाछिपी करता रहा
बयार का बहना जारी है
ज़िन्दगी आहटों में कटती रही
चारदीवारी के दरवाज़े पर
सांकल कहीं खनकता है
मन की सूखी गंगा में
कोई धार सी बहने लगती है
अनजान अंधेरी रातों में
कोई मांझी गीत सुनाता है
चारदीवारी के दरवाज़े पर
सांकल कहीं खनकता है।

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