रानी रूपमती की चाय दुकान

सचिवालय की बहुमंजिली इमारत के
सिरहाने पर है
फूलों का एक सुन्दर बगीचा
और पैताने पर है
रानी रूपमती की चाय दुकान

चाय दुकान के पास
कई तरफ़ से
सड़कें आकर मिलती हैं
इसलिए चाय दुकान महत्वपूर्ण है
किंतु और महत्वपूर्ण है यह
रानी रूपमती की चाय दुकान होने के कारण

रानी रूपमती कोई रानी-वानी नहीं
रूपमती कोई बहुत रूपवान भी नहीं
पर जवान है और थोड़ी गदराई भी
उसके हाथों में जुंबिश है
जो उछाल दे-देकर
स्पेशल चाय को अंजाम देती है

अल्हड़पन के कारण
उसकी बातें बेताली हैं
परंतु उसके अंग-अंग में ताल है
उस ताल से बंधे हैं
सचिवालय के कुछ अधपके बूढ़े
और पूरे पके जवान
जो फाइलों की उब से उबरने के लिए
उसके ताल में ताल मिलाने आते हैं
उसके पति राजा को
ये अधपके बूढ़े
‘गांधी जी’ कहकर बुलाते हैं
राजा, ‘गांधी’ बनकर बहुत खुश रहता है
काश! वह पर्यायवाची शब्दों का अर्थ जान पाता
वह सिर्फ़ दांत निपोड़ते हुए
पत्नी के काम में हाथ बंटाता है
हाशिए पर बैठा चाय के जूठे गिलास धोता है

सचिवालय के अधपके बूढ़े
रानी रूपमती की जुंबिश
और चाय की उछाल पर
मस्त रहते हैं
उसकी चोली, उसके गाल
उसकी चाल, उसकी ढाल पर
कुछ तुक्के छोड़ते रहते हैं
कुछ फुटपाथी, कुछ अर्धसाहित्यिक
गुलशन नंदा और रानू के उपन्यास की तरह

रानी रूपमती की जुंबिश जब और बढ़ जाती है
‘गा्धी जी’ की बत्तीसी
जूठे गिलासों में तीव्र गति से घुलने लगती है
अधपके बूढ़ों के हाथों में चाय के गिलास
और चाय के गिलास पर उनकी चुस्कियां
तेज हो जाती हैं
जैसे गिलास नहीं, रानी के ओठ हों
फाइलों की दुनिया से दूर
एक नई दुनिया
जहां सिर्फ़ वे और रानी रूपमती
और कोई नहीं
सब कुछ से बेखबर

चाय की उछाल पर
पूरा सचिवालय
सिरहाने से पैताने तक
उछाल मारता रहता है
फाइलों में योजनाएं फुदकती रहती हैं
ठेकेदार चाय पर चाय
बाबूओं को पिलाता रहता है
चाय के नाम पर
छुटभैये नेता भी यहां
कुर्सी-कुर्सी खेल लेते हैं

सब कुछ देखती
सब कुछ सहती
रानी रूपमती की चाय दुकान
तिराहे पर खड़ी
‘तीन हिस्सों को’ सम्हालती रहती है
आम आदमी
इसी तिराहे से होकर हर रोज
सचिवालय, विधानमंडल और न्यायालय
का रास्ता पकड़ता है
अनजान राहगीर भी राह भटककर
रुक जाता है इसी चाय दुकान पर
जहां रोज की तरह
रानी रूपमती की जुंबिश
अधपके बूढ़ों की चुस्कियां
और राजा उर्फ ‘गांधी’ की
दंत-निपोड़ जारी रहती है।

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