साथ साथ चलने का वक्त अब आया है

साथ साथ चलने का वक्त अब आया है
गुलाब के फूलों से लड़ने का वक्त अब आया है …
हिसा छोड़ के जीना है यहाँ नफ़रत की डोर को तोड़ने का वक्त अब आया है
सन संतावन बीत चूका है अब आया है सन तेरह …
जखम अभी तक भरे नहीं है इसको याद करने का वक्त अब आया है
नहीं होगा कुछ भी सुधार यहाँ पे क्योकि हम स्वार्थ में वशीभूत है अपने
अपने लिए जीने का नहीं किसी दुसरे के लिए मरने का वक्त अब आया है
मै हु शिव , २२ है मेरी उम्र अभी , दिल की है ये आरजू अपनी
की फूलों की सेज छोड़ काटों पे सोने का वक्त अब आया है
हाथों में हाथ रखकर सोचने का नहीं हाथों में हथियार लेके लड़ने का वक्त अब आया है
कैसे बदलेगी छवि इस विकृत होती समाज की
है इस देश में जमहूरियत पद्ध्यती , है यहाँ पे सबको नाचने की आजादी
कर्म की केवल आज़मइशि नहीं , उसे संकल्प के साथ करने का वक्त अब आया है
छोटा बड़ा कुछ होता नहीं , भरम का है खेल यह
खुद के कन्धों से नहीं कंधे से कन्धा मिलाकर बोझ ढ़ोने का वक्त अब आया है
समाज के स्वरुप को अदभुत बनाने का वक्त अब आया है ..
छुपी है तुमरे अन्दर तेज ख़ुदा की , कयाम की कल्पना छोड़ के
कर्मठ होकर कर्म छेत्र में उतरने का वक्त अब आया है
शुरू हुआ है तमस्विनी का आगमन ,होने लगा है ओञ्झल सब कुछ
इस अँधेरी रात में दीपक जलाने का वक्त अब आया है
कुछ और नहीं सिर्फ ख़ुशी और शांति के लिए लड़ने का वक्त अब आया है
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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