आज ज़िन्दगी कुछ अधुरी सी लगी

आज ज़िन्दगी कुछ अधुरी सी लगी,
एक कदम चलना भी मज़बूरी सी लगी,
मेरी बेबसी कुछ यूँ मुघपे छाई,
की हर मिली ख़ुशी अधूरी सी लगी।।

हर भरी महफिल में विरानियाँ थीं,
हर एक लफ्ज़ में तुम्हारी कहानियाँ थीं,
ज़िन्दगी तो काफी आगे चल पड़ी,
क्योंकि इसके पास तुम्हारी हर निशानियाँ थीं।।

एक हलचल हुई पर कोई शोर न था,
रोक लूँ खुद को इतना ज़ोर न था,
गलियां तो बहुत मिलीं मुघे,
लेकिन किसी गली का रुख तेरी ओर न था।।

हर गली में ढूंढा तुम्हें,
हर शख्स से पूछा तुम्हें,
आख़िर ऐसी कौन सी कमी हो गयी,
की दुनिया छोड़ना ही सुघा तुम्हें।।

हर तुम्हारा अपना पूछता है तुम्हें,
हर भरी महफिल में खोजता है तुम्हें,
नियति की हकीकत का तो पता नही मुघे,
पर  हर आने वाले लम्हों में बस सोचता है तुम्हें।।

5 Comments

  1. Brijesh Neeraj 04/03/2013
  2. Prritiy 04/03/2013
  3. mahendra gupta 05/03/2013
  4. ik purani yaad 21/08/2015

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