सब कुछ था अब पहले जैसा क्योकि संभल चुके थे हम

किसी की उलफ़त में इस कदर खो गये थे हम
खुद को भूल कर खुद से दूर हो गये थे हम ….
खुद को समझाने की कोशिश तो बहुत की हमने
पर आहिस्ता आहिस्ता समझ को भूल गये थे हम
हमारे आशिक़ाना चरित्र को देख लोग अचंभित से हुए
वो हमसे कुछ पूछ ही रहे थे इस खेल के बारे में
की फिर से उनकी ख्यालों में मशगूल हो गये थे हम …
कोई कहता पागल हु मै कोई कहता बेचारा हु …
कोई कहता ये अल्पकालिक क्रिया है कोई कहता है ये है नैसर्गिक
गहमा गहमी शुरू हुई लोगों में हमी को लेकर
फिर क्या था , नासमझ थे प्यार को लेकर हम
था छडिक उद्दीपक अपने दिल में उसके प्रेम को लेकर
कुछ नहीं था ये सब, बस पल भर के लिए ग़र्दिश में हो गए थे हम
अगले दिन जब सुबह हुई
उदित हुए हम तेज को लेकर , संकल्प था अपने पास
उत्सर्गी थी भरी अब रग रग में अपने ,क्योकि अब बदल चुके थे हम
आज़िज़ी नहीं थी अपने ह्रदय में , न ही था अफ़सोस यहाँ
सब कुछ था अब पहले जैसा क्योकि संभल चुके थे हम
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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