ज्योत्स्ना में खुद की परछाई देख कुछ पल उसमे खो जाना कुछ अदभुत सा लगता है

चलते चलते ठोकर खाना , ठोकर खाके यूँ गिर जाना
सब कुछ अदभुत सा लगता है
ज्योत्स्ना में खुद की परछाई देख कुछ पल उसमे खो जाना
कुछ अदभुत सा लगता है
देख देख दूसरों की उड़ान को, दिल में खुद उड़ने की चाहत का पैदा होना
कुछ अदभुत सा लगता है
अपने इन हाथों से सीधी लकीर खीचना कुछ अदभुत सा लगता है
खुद की दम पे नया इतिहास लिखना कुछ अदभुत सा लगता है
पैदा हुए है तो कुछ न्य जरुर करेंगे हम
बिन कुछ किये उही मिट जाना कुछ अदभुत सा लगता है
पहले हम उत्साहित थे अपने कर्मों को पूरा करने में ..
वक्त जब आया करने को तो सर पे हाथ रख के बैठ जाना
कुछ अदभुत सा लगता है ..
दौड़ते दौड़ते रुक रूक कर सांसे भरना ये तो अच्छा लगता है
बिन दौड़े उ बैठे बैठे तेजी से आहें भरना कुछ अदभुत सा लगता है
समुन्दर तो पास में ही था , पानी की हमें तलाश थी
सागर को देखकर उसे सागर न समझना बड़ा अदभुत सा लगता है
सांसों को खुसबू की तलाश थी , फूलों की बगिया बगल में थी
खुसबू होते हुए भी खुसबू को महसूस न करना बड़ा अदभुत सा लगता है
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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