ज़ुबा पे नाम किसी और का था , दिलों में कोई और छिपा था

ज़ुबा पे नाम किसी और का था , दिलों में कोई और छिपा था
आँखें किसी को प्रत्यक्ष: देख तो रही थी पर नज़रों में कोई और बसा था
हर पल किसी न किसी के संगत में थे हम
फिर भी संगत में होकर संगत में न रहने का कारण भी कोई और ही था …
कदमे बड़ रही थी किसी की खोज में हर वक्त, तलाश थी किसी की शायद उन्हें
हर कोशिश के बावजूद उनके न मिलने का कारण भी कोई और ही था …
ख़ुशी का माहोल था चेहरे मुस्कान भरे थे सबके
हम भी मंद मुस्कान दे तो रहे थे लोगों के लिए
पर दिल से प्रफुल्लित न होने का कारण भी कोई और ही था
कुछ पल के लिए लगा की जीत गए हम
पर जीत के बाद हारने का कारण भी शायद कोई और ही था
सब कुछ बिक चूका था उनका , बस उनके दिदार के लिए
नजरें तलाशती हुई झुक गई और वो विवश होकर कह गए इसका कारण भी कोई और ही था …
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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