नाम की खातिर इस जहाँ में कैसे लड़ रहे है सब ..

नाम की खातिर इस जहाँ में कैसे लड़ रहे है सब ..
खुद को आगे रखने के चक्कर में खुद से पिछड़ रहे है सब …
अपनों के साथ ही बड़ रहे है वो पथ पे
फिर न जाने अपनों से कैसे बिछड़ रहे है सब ..
क्या लालसा है उनकी , क्या वजूद है उनका यहाँ
अनजान है सब खुद के अंतःकरण से
फिर भी न जाने कैसे जीतने की तमन्ना किये है सब …
परतोख की यहाँ कोई जगह नहीं है दयानत का है आभाव यहाँ
शांति होगी स्थापित यहाँ ,फिर कैसे समझ रहे है सब …
कर्कशता है यहाँ यहाँ बसी लोगों के हर बोली में
ऊल जलूल के कथनों में खुद को सिकंदर समझते है
दीन- दुखियों का इमदाद किये , खुदा मिलगे उनको , ये कैसे समझ रहे है सब ….
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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