सूरज की किरणों को बादल से निकलते देखा था …

सूरज की किरणों को बादल से निकलते देखा था …
पंख फैलाएं परिंदों को असमान में उड़ते देखा था ..
जब चलते थे हम उगली पकड़ कर बचपन में …
तब हमने सब कुछ अपनी बाँहों में गिरते देखा था
कुछ आकान्छाएं होती थी अपनी बचपन में …
उन सब को कहने से पहले पूरा होते देखा था
पंख फैलाएं परिंदों को असमान में उड़ते देखा था ..
जब हमने अपने पैरों को खुद से रखना शुरू किया
तब हमने हर लम्हें को अपने पास से गुजरते देखा था …
जैसे जैसे बचपन अपनी बदलती गई जवानी में …
खुद को तब से अपनों से दूर होते देखा था …
आँखों में आंसू वही रहे पर अब
इसको अपने पूज्यनीय लोगों के आँखों से गिरते देखा था
कोई करिश्माई कृत्य नहीं थे ये सब बस
हमने खुद को खुद से बदलते देखा था
पंख फैलाएं परिंदों को असमान में उड़ते देखा था ..
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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