आत्मचिंतन

जब जब उनको बढ़ते देखा,
नई इबारते गढ़ते देखा
हमने,
बैचेनी को रूक ना पाये,
घुटन बढ़ी है,
साँसो को हमने रोसा है,
हमे ही क्यूँ छलती रहती,
ज़िंदगी को हमने कोसा है।

साथ चले थे जो कभी डगर पर,
खेले, कूदे, साथ पढे थे,
क्या कुछ किया ?
पता नहीं,
पर,
वो आगे आज बढ़े थे।

किसकी थी गलती नहीं जानते,
खुद को कमतर नहीं आँकते,
पर,
शायद था भाग अधूरा,
उनसे बेहतर,
किश्मत अपनी,
हम नहीं जानते।

सच तो ये है, जग में उनका,
नाम सफलतम लोगों में है,
बने फिरते खुद मियां मिटठू,
पर अपनी गिनती, नाजोगों में है।

शायद जीवन की दुनियादारी,
हम पर पड़ रही है भारी,
क्या इसका आचार डलेगा,
क्या कर लेगी ये खुद्दारी,
चोर होते हम भी समाज के,
तो,
सामने झुकती दुनिया सारी।

पर अंतिम मूल्यांकन बाकी है,
मिलेगी पहचान हमे भी,
अभी हौसला काफी है,
मंजिल मिले ये नहीं जरूरी,
कदम उठे तो काफी है।

हमने भी कदम उठाए है,
कुछ पल गौरव के,
कमाए हैं,
मिट गए तो क्या पर,
हौसला तो नहीं तोड़ेंगे,
धूल पड़े ऐसी कामयाबी पे,
पर खुद की खुद्दारी,
नहीं छोड़ेगें।

हे ईश्वर ! तू साक्षी रहना
मन के बल को सबल
बनाना,
भूले से गलती ना हो जाये,
कदम-कदम पर,
हाथ बढ़ाना।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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