संकल्प —लक्ष्य के प्रति

अँधेरी रात में खामोशियों के साथ अँधेरे को चीरते हुआ आगे चलते जा रहा था वो
भय साथ में था और बादल विरोध में थे , तारें मानों छुपने की उम्मीद से उगे हो
खुद की परछाई से भी वाकिब नहीं थे वो ,बस खुद को खुद की परछाई समझकर बढ़ते जा रहा था वो
घनघोर बादलों की गर्जन उसे झुकाने की ताक में थी और उस पर दृष्टिपात किये जा रहा था वो
सशक्त थी उसकी आस्था , निर्भीक था वो ,खुद पे यकीं था उसे
अपने हाथों की दो उगलियों को असमान में लहराए जा रहा था वो ..
कुछ कहना चाहता था हम सभी से शायद इसलिए तो अँधेरे में ही बढ़ते जा रहा था वो
अंधेर रात में तो सब अनजान थे उसके कृत्य से
जब सूरज की पहली किरण पड़ी उस जगह पे तो पता चला की दुनिया को जितने की लकीर खिचते जा रहा था वो ….
कुछ और नहीं बस यही सन्देश देने के लिए रात में अकेले बढ़ते जा रहा था वो ….
♥♥♥शिव कुमार सिंह ♥♥♥

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