एक सोच

नजरें उनकी उठी हुई थी , नजरें सबकी झुकी हुई थी
नज़रों का ही खेल बचा था , नज़रों का ही खेल बचा था ,
कुछ तो मिथ्या बातों में खुद को इन्शान समझते थे
नहीं पता था शायद उनको उनकी भी गिरी पड़ी थी
कुछ तो नाजुक शब्दों में दुनिया को सिमटने बैठे थे
बस थोड़े ही पल में उनकी मीमांसा खुद की तरफ मुड़ी पड़ी थी
मुख़ातिब हो रहे थे सब एक दुसरे के वचनों से
सत्य की चेष्टा दूर थी अभी क्योकि सबको अपनी परी पड़ी थी
वक्त की आंधी ऐसी आई भ्रम का दामन छुट गया
एक ही था शेर वहा पे जिसकी सबसे लड़ी हुई थी
ध्वन्सित हुए सभी वहा पे बस उसके ही कथनो से
कथनों में उसके ओज छिपा था जिससे सबकुछ दिखी पड़ी थी
यह था कारन जिससे, नजरें सबकी झुकी हुई थी नजरें उनकी उठी हुई थी ,

2 Comments

  1. manuprakashtyagi 01/03/2013
  2. dharmendra 01/03/2013

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