मेरी पहली मुलाकात मौत से

मैं उस रास्ते से आहिस्ता आ रही थी,
सामने मौत आगे चलती जा रही थी,
मैंने पूछा तू इधर कहा,
कहा किसी की आखिरी विदाई कराने आई थी।।

मैंने पूछा तू लेके सबको जाती कैसे है,
किसी को किसी से दूर करके रह पाती कैसे है,
जब होगा तेरा सामना कभी अकेलेपन से,
तब पता चलेगा की तन्हाई सही जाती कैसे है।।

आज भी वो दिन याद है जब मैंने अपनों को खोया था ,
हर वो सपना टुटा जिसे जतन से पिरोया था,
तुघे तरस नही आई मुघपे बिलकुल भी,
जबकि उस दिन खुद ख़ुदा भी रोया था।.

खुद किसी को खोके देख तब पता चलेगा,
सामने किसी को जलते देख तब तेरा दिल भी जलेगा,
खुद भी तू रो पड़ेगी अपनी बेरहमी पे,
और तब तक तेरा अपना तेरे से बहुत दूर जा चूका होगा।।

ये बातें सुनके उसकी आँखें भर आयीं,
कुछ देर रुकीं और फिर छलक आयीं,
फिर उसने मायूसी से कहा की इसमें मेरी गलती क्या है,
जब रब ने ही ये जुदाई मुघे सौगात में सीखाई।।

अकेली थी मैं और डर था मुघे किसी खौफ से,
रास्ते में मौत मिली जिससे मिली मैं शौक से,
यूँ कह डाली सारी मन की बातें उससे ,
और कुछ यूँ रही मेरी पहली मुलाकात मौत से।।

4 Comments

  1. Rahul 01/03/2013
  2. jyotsna 02/03/2013
  3. naman singh 17/05/2013
  4. naman singh 17/05/2013

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