राह पर सदाक़त के  गर चला नहीं होता – SALIM RAZA REWA

    ग़ज़ल
राह पर सदाक़त के गर चला नहीं होता –
सच हमेशा कहने का हौसला नहीं होता –

कोशिशों से देता है रास्ता समंदर भी-
हौसला रहे क़यिम फिर तो क्या नहीं होता-

डूबती नहीं कस्ती पास आके साहिल के –
गर हमें किनारों का आसरा नहीं होता –

कम खुशी नहीं होती मेरे घर के आँगन में –
दिल बंटा नहीं होता घर बंटा नहीं होता-

थोड़े ग़म ख़ुशी थोड़ी थोड़ी सिसकियाँ भी है-
ज़िन्दगी से अब हमको कुछ गिला नहीं होता-

उसके बढ़ते क़दमों को मुश्किलों ने रोका है-
वो सम्हल नहीं पाता गर गिरा नहीं होता-

हम भी खेलते रहते मौज -ए – समंदर से –
बे वफ़ा अगर मेरा ना खुदा नहीं होता

GAZAL- सलीम रज़ा रीवा 9981728122
[म .प्र .] 15.01.2013

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