रहते हैं इस ज़मीन मे अम्नो -SALIM RAZA REWA-GAZAL

रहते हैं इस ज़मीन मे अम्नो अमाँ से लोग
करते हैं प्यार  गुलशने  हिंदोस्ताँ  से लोग !

पाते हैं चैन आपके सब  आस्ताँ  से  लोग
चौखट  पे तेरे  आते है सारे जहाँ से लोग !

अहले आदब  कि  बज़्म मे मक़बूले आम है
करते हैं प्यार आज भी उर्दू ज़बाँ से लोग !

कैसा ये  कहर  कैसी  तबाही  है या खुदा
बिछ्डे हुए है अपनो से अपने मकाँ से लोग !

लगता है कुछ खुलुसो मोहब्बत मे है कमी
क्यूं उठ के  जा रहे हैं तेरे दरमियाँ से लोग !

क्या हमनशी का सिह्रर भी चलता है इस तरह
मिलते नही ख़ुलूस से क्यूं अपनी माँ से लोग !

तेरा   ख़ुलूस  तेरी  मोहब्बत  को  देखकर
जुड्ते गये  हैं  आके  तेरे  कारवाँ से लोग !

shayar salimraza rewa

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