कविता जो तुमसे छोटी रह गयी

कविता जो तुमसे छोटी रह गयी
तुम्हारे बड़े होने के अभिमान में
हो गयी और छोटी
हो गयी नीची आँखे उसकी
चुनरी में दबक गयी
साथ लिए असंख्य पीड़ाएँ , कामनाएं ,आकांक्षाएँ
जो गुणित होती थी तुम्हारे होने के साथ
बढती थी दिन- ब -दिन ,
नव्योवना होती हुई
और समाँ लेती थी तुम्हारे अन्दर के ताप को
अपने अन्दर
लेकिन अब उठ खड़ी है कविता मेरी
लेने लगी है स्वयं के निर्णय
पाने लगी है अपने हिस्से की जमीं और आसमान
छिनकर
अपने पूर्ण हक़ के साथ
अपने अन्दर की ताप से होती
स्वर्णिम और ओजस्वी
दिन-ब-दिन
देखती दुनिया को अपने परखे चश्मे से
करती खाली अपने यादों के बटुए को
दिन -ब – दिन…
एक समंदर के किनारे
कुछ रचते हुए
दिन -ब -दिन ……….

3 Comments

  1. yashodadigvijay4 27/02/2013
  2. अदितिपूनम 02/03/2013
  3. kavita rawat 02/03/2013

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