धरती से फलक को मिलाती हो

आज मैंने ज़िन्दगी को इस पन्ने पे उतारा है,
वो सारी चीजें जिससे मैंने इसे संवारा है,
बहुत सी चीजें पायीं और बहुत सी खोयीं भी,
कुछ के लिए हंसी और कुछ के लिए रोई भी।।

ख़ामोश रहके  भी बहुत कुछ कह गयी,
बहुतों का सामना किया और काफी कुछ सह गयी,
मंजिल एक थी पर रास्ते कई थे,
चल पड़ी मैं,क्या पता कौन से सही थे।।

हर मंजील से पहले ऊँची दीवारें थीं,
रिश्ते तो सब सही थे बस कुछ में दरारें थीं,
उन दरारों को मिटाना इतना आसान ना था,
अकेली पड़ गयी मैं क्योंकि मेरे साथ भगवान ना था।।

कहने को हमेशा भगवान साथ रहते हैं,
पर सामने क्यों नहीं आते जब हम सब सहते हैं,
ऐसी ही बातों से मेरा यकीन डगमगाता है,
जब हर कोई अपना कह यूँ तनहा छोड़ चला जाता है।।

अन्जान राहें थीं,और मंजील भी दूर थी,
तुमसे मिलना था,इसीलिए चलने को मजबूर थी,
काश मिल जाती वो राह जो तुम तक जाती हो,
एक ऐसी राह जो धरती को फलक से मिलाती हो।।

2 Comments

  1. yashodadigvijay4 27/02/2013
  2. DEV MISHRA 26/03/2013

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