जन्नत की किसे ख्वाहिश थी

जन्नत की किसे ख्वाहिश थी

हम जहन्नुम चले जाते
तेरे हुश्न की अगर आखिरी
लम्होतक जीया होता
शिकवे की नौबत नही आती
अगर होस् मे हम होते
लानत है उस खौफ़ की
आखिरी बुँद भी पिया होता
लड़खडाने की शौख ने हि
अबतक सम्हाला है हमे
पिये तो जियेजाते है बरना
बुझती दिया होता
आबरु है कहा इधर अब
जो लुटनेका खौफ़ हो
मुजरे मे लुटाने के लिए
तकदीर लिया होता
बेहतरिन थी वो जिन्दगी भी
जब हम घर पे बैठे थे
दुल्हन कि ख्वाहिश थी की
हम उनके मीयाँ होता
हरि पौडेल

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