प्रेम का वरदान दे दो।

प्रेम का वरदान दे दो।
चेतना का गान दे दो।।

जिन पदों में प्रीत की
सुरभित, तरंगित रश्मियाँ हों।
सूर, कबिरा और तुलसी की
मनोहर वाणियां हों।
उन पदों से वेदना को
प्रिय! तनिक विश्राम दे दो।
चेतना का गान दे दो।।

सुप्त हैं चिरकाल से जो,
उन तरंगो को जगा दो।
जड़ हुए इस सुप्त मन में
चेतना के पर लगा दो।
सप्त स्वर में वास कर,
नव-गीत की मृदु तान दे दो।
चेतना का गान दे दो।।

3 Comments

  1. yashoda agrawal 25/02/2013
  2. vandana 27/02/2013

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