ये कलजुग है

राम की माला सब जपत है,
इन्सान के ना पूछे कोए,
अमीर के घर सब जाये हैं,
चाहे गरीब खड़ा रोये।।

इन्सान न पहचानत इन्सान के,
पहचान बस धन पर होए,
समय रहत कर्म किये नहीं,
तो अब काहे किसमत  को रोये।।

आज जमाना उल्टा है,
सब नदी में हैं जौ बोये,
खेत में न जाये कोई,
बस पूछे फसल कब होए।।

आज किसी  का कोई नहीं,
सब अपने में खोये,
और जब जरुअत आन पड़ी ,
तो काहे  दरवज्जे खड़े रोये।।

कहे कवि मत हो निरास ,
जौन  होए तौन  होए,
भईया ई कलजुग है ,
एमे नाही गलती कौनो तोये।।

4 Comments

  1. rahul 23/02/2013
  2. saurabh 23/02/2013
  3. shiwi singh baghel 09/08/2013

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