नशा ऐ तमररुद में जब बन्दा मगरूर हो जाता है

नशा ऐ तमररुद  में जब बन्दा मगरूर हो जाता है 

खुद अपनी खुदी से टकरा कर चूरचूर हो जाता है 

 

बहुत मान था के यह कभी न डूबने वाला जहाज़ है 

टायटेनिक पानी के ढेर से टकराकर चकनाचूर हो जाता है 

 

कल वह शख्स मिल गया जो कोलेज का हीरो होता था 

वक्त की मार से  शहरयार भी बे रंग ओ नूर हो जाता है 

 

पैसा इंसान को करीबी रिश्तो से कितना दूर कर देता है

नामुराद को आका बनाकर खुद कितना मजबूर होजाता है

 

कल जो कुछ भी नहीं था  वक्त के करवट बदलते ही

हर एक रिश्तोआम के लिए वह जी हुजुर हो जाता है

 

अपनी इबादतों बे इतना भी मत इठ्लाओ शेख जी

उस दरबार में तो एक नेकी से भी बेडा पार हो जाता है

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