तू बरसती क्यों नही?

तू मेरी तो नही शायद,
उदासी के धुएं से
कुछ बूँदें उधार लेकर
तू बरसती क्यों नही।
किसी स्वप्न की आहट लेकर,
निद्रा की चादर ओढ़े,
ओस से झिलमिला,
तू बरसती क्यों नही।
पग प्रगाढ़ कर,
काटों का दामन छोड़,
जीवन विस्तार पे,
तू बरसती क्यों नही।
विलाप के संचार पे,
क्रंदन करते जलमग्न ह्रदय पे,
रोते हुए धरा पे,
तू बरसती क्यों नही।
खुद से या खुदा से,
किस्से पूछूं,
तू बरसती क्यों नही।

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