मानवता का उद्घोष

इस पावन धरती पर फिर मानवता का उद्घोष बजेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||

तुम कहते हो तिमिर प्रबल है,
दीप आस में आह विकल है |
मानवता के रक्तित शव पर,
दानवता का खड़ा महल है |
पर पापों के बढ़ने से ही, होता ईश्वर का अवतार |
बिन पापों के कैसे पूजे ईश्वर को सारा संसार |
मोक्ष-दायिनी अमर धरा पर पुनः सत्य का बीज फलेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||१||

तुम कहते हो भौतिकता है,
जीवन अविरल दौड़ रहा है |
धन-लिप्सा की आंधी में,
मानव का मन भी डोल रहा है |
कभी तुम्हारे मन ने भी, हो व्यथित, प्रश्न ये उगले हैं ?
जिन्हें समझते मानव हम, वे केवल मानव पुतले हैं |
इक दिन हर मानव के मन में मानवता का बीज फलेगा |
दीपक की ज्वाला में प्रतिक्षण अहंकार अज्ञान जलेगा ||२||

Leave a Reply