संक्रांतिकाल

संक्रांति की भोर हुई,
विभ्रांति की है शाम,
संक्रान्तिकाल* का स्वागत करे भारत की आवाम,
भारत की आवाम, करे कुछ क्रान्ति की बात,
लिखे कोई इतिहास नया, करे फिर भारत को आज़ाद,
करे भारत को आजाद, की सहे आशिन आघात,
सहना आशिन आघात, होता पुरषार्थ का अभिमान,
पुरषार्थ का अभिमान, जीवित जाती का एक मात्र प्रमाण,
जीवित जाती का प्रमाण, नष्ट करना कर्दन पाश,
राष्ट्रमार्ग के कंटकों – का अब कर दो सत्यानाश,
कर दो सत्यानाश, नहीं कोई इसे फिर पाप कहेगा,
अनय का अवरोध – जागृत जन का संताप कहेगा,

अनय का विरोध करने माना शांति श्रेष्ठ है शस्त्र,
किन्तु भरे दरबार में गर उतर रहें हो द्रुपदसुता के वस्त्र,
सत्ता मद में चूर अंध-मूक बधिर शासन से जनमानस हो त्रस्त,
तब करना शांति की बात महा पाप है,
पाप है क्लीव सा देखना लज्जा हरण, धर्मराज का,
है पुण्य, भीम के लोचनो की जो आग है!!!
भीम के लोचनों की आग ही, सत्य है,पवित्र है, पुरषार्थ का पराग है,
साश्वत पूण्य, विरोध अन्याय का – शिव का विराग है,
नरो उठो बनो नारायण- करो जो किया रण बीच भारत पार्थ हित घनश्याम ने,
या किया अधीर हो सिन्धु तट पर मर्यादित-शांतिप्रिय राम ने,
क्यूंकि शांति का वश चलता नहीं सदैव,
पतित समूह की कुवृत्तियों के सामने!!!!

पतित समूह को अब शक्ति का प्रमाण दो,
कुवृतियों से त्रस्त त्रासदी को त्राण दो,
उठो की लिखो कोई नयी कहानी पुरषार्थ की परमार्थ की,
अब गिरे आहूत यज्ञ में स्वार्थ की,
उठो की लोहित से वापस उठालो, गिरा परशु परशुराम का,
केवल राष्ट्रधर्म ही अब परम धर्म हो आवाम का,
उठो संक्रांति काल है पूर्वजो के पापो को अपने हाथो से मार दो,
बनो भागीरथ कोई भागीरथी फिर भारत में उतार दो!!!!!

संक्रांति की भोर हुई,
विभ्रांति की है शाम,
संक्रान्तिकाल* का स्वागत करे भारत की आवाम!!!!!

*बदलाव का दौर (Era of transition)

Leave a Reply