वी.आई.पी.

जी हाँ हर तरफ आम आदमी त्रस्त है,
क्योंकि घिरा है कुछ खास लोगों से,
और वीआईपीयों से पस्त है।

सुबह सुबह मंदिर की तरफ नजर पसारी,
तो बड़े सलीके से खड़े थे पुजारी,
फिर चाहे बालाजी हो या मुरारि,
क्या फर्क पड़ता है उमा हो या त्रिपुरारी,
हर मंदिर में इन खासों का ही थपोटा है,
क्योंकि दर्शन करने का भी वीआईपी कोटा है।।

छः दिनों बाद जब रविवार की छुट्टी आई,
तो सोचा कई दिनों से कटिंग नहीं करवाई,
नाई की दुकान आए सोचा करवालेंगे दाड़ी,
पर वहाँ तो पहले ही खड़ी थी विधायकजी की गाड़ी,
नाई ने सात दिन पहले का कौल तोड़ दिया,
विधायकजी की चंपी करने लगा, हमे चेले पे छोड़ दिया।।

एक दिन अचानक हमें बुखार ने आ दबोचा,
हमने भी अस्पताल में डॉक्टर को दिखानें का सोचा,
लाईन लंबी थी, फुर्सत नहीं थी डॉक्टर के पास,
पर अचानक सफ़ेद कुर्ते में आ गया एक खास,
आते ही डॉक्टर के सामने कुर्सी पे बैठा धम्म,
एक और वीआईपी आ धमका समझ गए हम।।

बिजली के दफ्तर में जमा करानी थी कनेक्सन की फाइल,
और प्यारे अपना तो वही रहा पुराना स्टाइल,
धूप थी तेज हम जिद पे अड़े थे, जैसे तैसे खिड़की पे खड़े थे,
इतने में काला चश्मा सूट देख चपरासी दौड़ पड़े थे,
पता किया, पता चला, ये जलदाय विभाग के बाबू बड़े थे,
हमारी तो किश्मत ही थी, जो वीआईपी पीछे पड़े थे।।

सिनेमाहॉल में शाहरुख की एक नई फिल्म लगी थी,
हाउसफुल की तख़्ती टिकट खिड़की पे टंगी थी,
हमने मायूस हो जैसे ही साइकिल को संभाला,
सामने खड़े सिक्योरिटी गार्ड ने सलाम ठौक डाला,
गले में भारी हार, भारी तन पर जरदोज़ी साड़ी,
आके अहाते में रुकी एक वीआईपी की गाड़ी।।

दादाजी बूढ़े हो चले हैं, उन्हे गंगा स्नान कराना था,
कुछ पुण्य हमे भी मिले, सोच के हरद्वार जाना था,
रेल की आरक्षण खिड़की पे आके यात्रा अटक गई,
जीआरपी डिप्टी साहब की छोकरी, पीछे से ही टिकट गटक गई,
दुख पायेंगे दादाजी ये सोच लोकल की यात्रा कैंसिल कर दी,
हमने तो भैया अपनी कुंडली इन वीआईपीज के नाम धर दी।।

रेल हो या हो जेल, बस हो या हो मंदिर,
सब जगह वीआईपी, सोच चकराया मेरा सिर,
मैं चला गया एक मरघट, शायद वहाँ तो शांति होगी,
दुनिया का आखिरी स्टेशन है, जनता जानती होगी,
पर यहाँ पर भी जैसे जमाना मुझे छल रहा था,
एक तरफ एक वीआईपी लाश के पास सैंकड़ों खड़े थे,
दूसरी तरफ एक आम, चुपचाप जल रहा था।।

मनोज चारण

मो. 9414582964