ग़जल

हम चाँद पर मर मिटे तो

आफताव भी जलने लगी
बिजली की तड़प देखकर
बादल भी बरष रोने लगी
हिमालय की छातियों से
दुपट्टे बरफ सरकने लगी
पहाडियों के घाटियों से
झरने भी तब छलकने लगी
पेड़ों से परिंदे भी तब
जब चह्चहाने लगी
रातें भी शर्मा के सुबह की
आगोश मे सोने लगी
तुफानी हवाके झोंके
नशेमे लड़खड़ाने लगी
मौसम भी इतराके तब
बस वही बहकने लगी
जब चाँद गयी सोने वही
सुरज नीकल झाकने लगी
गुस्सा हुवा बादल तब
बिजली बन कडकने लगी
छुप गया सुरज कहीं तब
आँखे भि भिगोने लगी
बादल भी गुमसुम हो गया
और बर्षात बन रोने लगी
हरि पौडेल
नेदरलैंड
03-02-2013

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