मुस्कुराने के वजह!!!

मुस्कुराने के वजह!!!

पहले बहोत से थे,

कभी नन्ही सी तितली को देखकर

उसके पीछे भागना,

तो कभी,

खाली माचिस की डिबिया को उछालना…

कभी सन्तरे वाली टॉफी पाकर

यूँ लगता, जैसे सबकुछ तो मिल गया है.

तो कभी

अंगूर के गुच्छे पाकर!

 

कभी चीनीवाली वो मिठाई,

तो कभी रामनारायन चाचा के यहाँ की जलेबी…

वो कंचे, वो गिल्ली-डंडा,

वो दिवाली के दिए,

वो पाँच छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़े,

वो कागज़ से तरह-तरह के बने खिलौने,

और ना जाने क्या-क्या!!

 

खुशियाँ बहोत छोटी-छोटी थीं,

पर उनसे जिस्म ही नहीं,

रूह तक मुस्कुरा उठती थी…

और यूँ लगता,

जैसे और कुछ चाहिए ही नहीं,

सब कुछ तो मिल गया है!!!

 

पर आज,

खुशियाँ कितनी सिमट गयी हैं,

तीन साल में मिला कोई Promotion.

दो साल में पूरा किये हुए

किसी Project के लिए Boss की बधाई.

पुरे साल भर में Achieve किया हुआ कोई Target..

और महीने की पहली तारीख को आई हुई Salary …

 

और उसपर भी ये ग़म,

कि पहले सप्ताह में सब ख़तम…

 

शायद,

कुछ ज़्यादा पाने की ख़्वाहिश में,

जो थोड़ा पास था वो भी गंवा बैठे हैं.

आँखों में लिए फिरते हैं समन्दर,

और Plastic Smile से सब छुपा बैठे हैं..

मुस्कुराने के वजह तो कुछ भी ना थे,

बेवजह ही हम मुस्कुरा बैठे हैं…

बेवजह ही हम मुस्कुरा बैठे हैं…