अतीत की स्मृति

जिस ग्राम की अपार सुषमा मयी

मनोरम वनस्थली के बीच चिर-

संस्कृति की मषाल लिये आदिम

जन-जाति की छाया डोलती है-

उन्हीं मानवता के अग्रदूतो को

सादर समर्पित है।

 

 

विष्णु दत्त गुप्त

 

 

 

 

 

 
1

1

माँ भी ममता छोड़ चल बसी

आजी ने ही दुलराया

समझ निपट माटी का छीना

जिसे जगत ने ठुकराया।

2

शैषव सोनहत ने सँवराया

रवि ने सोना ढलकाया

रम्य वनों ने गिरि श्रृंगो ने

मलय वायु ने सहलाया।

3

दुख बदली ने उमड़ घुमड़ कर

जीवन नभ को सरसाया

आँसु की लडि़यों ने मुझको

जीवन देकर पनपाया।

4

जहाँ भगीरथ से चाचा ने

नेह गंग जल ढलकाया

मृदु भावों के सुखद हिंडोले

में थपकी दे बिरमाया।
2
5

आती याद आज फिर से है

सोनहत के चैपालों की

‘हसदो‘ ‘झरिया‘ और ‘चैतरा‘

ढोढ़ी सुघर सुनालों की।

6

कलकल निर्झरणी की

तितली की बारातों की

आम्र-कुच्ज में पिक गायन की

सरवर के जल-जातो की।

7

‘ताँतू‘ के सुन्दर त्रिताल की

भूखन के मंजीरे की

‘गँजहा‘ की खंजरी ललित बिच

रामायन फिर धीरे की।

8

तरावली सजाती ज्यों ही

शाम गगन अभिराम में

सभी ग्रामवासी जुटते थे

दादा जी के धाम में।
3
9
उधर इंदु चाँदी से भरता

धरा सुन्दरी की थाली

दादा की अमृतवाणी से

भर जाती उर की प्याली।

10

बजता ग्रामोफोन एक ढिंग

लगते पान धरी थाली।

सहज बड़े झगड़़े निपटाते

हँस न्याय से बलषाली।

11

आती याद भग्न शाला की

गिरी हुई प्राचारों की

जहाँ बैठ शीतला गुरू जी

याद कराते वीरों की।

12

क्दली का उद्यान मनोरम

बेला, जुही, चमेली की

सजी सजाई दुल्हन जैसी
चंपक डार नवेली की।

4
13

आतीं याद रूल की मारें

‘बनवारी‘- औ‘ ‘नान‘ की

सेहन भैया कान ख्ंिाचातें

च्पत लगाते जानकी।

14

आती याद आज ‘कैरा‘ की

‘दादी लादी‘ खेल की

शुभ्र-पंख ने नभ में फिरते

घड़ी घड़ी बगमेल की।

15

आती याद आज षिवजी की

और ‘चैतरा‘ कुंड की

अमराई में मृग शावक के

समुद बिहरते झुंड की।

16

जहाँ मनौती करने वाली

जुटतो भीड़ अपार थी

होती कृपा सद्य मिलता था

जीवन-रथ का सारथी।

5

17

मंगल राम पुजारी करते

पूजा शलिग राम की

संध्या नित आरती सजाते

राम जानकी श्याम की।

18

गुंजित होता आसमान था

शंख, मृदंग, मजीरे से

च्ुदन अगर तगर की खुषबू

पवन चुराता धीरे से।

19

घी के जलते दीप सलोने

घर श्री का आगार था

बहती नदी दूध की छलछल

मक्खन का भंडार था।

20

लाल मलाई दुग्ध कुंभ की

मोटी सुघर सलोनी की

आजी से लड़कर लेते थे

आती याद करोनी की।
6

21

बिजली के डोले में आता

गगन धरा को ब्याहने

बोर बधूटी चैक पूरती

बने जलद थे पाहुने।

22

बंदनवार सजाते वन थंे

नव किसलय से गात में

मोती की झालर लटकाते

जुगनू सारी रात में।

23

मंगल गीत सुहाने सुनते

झिल्ली की झनकार में

दादुर वेद मंत्र कह देते

नदी नद्य जलधार मंे।

24

हरित चूनरी बैठी

धरा क्षितिज के पालने

इंद्र-धनुष की मौर बाँध कर

गगन मिल रहा सामने।
7

25

कसक उठी सरिता के मन में

उमही सारी रात में

चली सिंधु से आतुर मिलने

बाँध तोड़ बरसात में।

26

मेघ मृदंग बजाते रमते

नन्दन वन के गैल में

मत्त मयूरी रंभा बन कर

नर्तन करती शैल में।

27

आती याद आज फिर मुझको

उन भोले ग्रामीणों की

मिट्टी से सोना उपजाने वाले

परम प्रवीणों की।

28

जिनके तन में वसन नहीं है

असन नहीं है खाने को

जिनके बच्चे ललकरहे हैं

मुट्टी भर के दाने को।
8

29

दस बच्चों में दो रोटी बस

बन घुँइया का साग था

लकड़े की चटनी संग खाते

जिसका जैसा भाग था।

30

मँा सोती थी पेट थाम कर

कृषक कराहे कोने में

बच्चे बिलख बिलख रह जातें

पानी पी कर दोने में।

31

नभ था अश्रु-विंदु ढलकता

धरा सँजोती थाली में

देख दुर्दषा प्रातः प्राची

उषा लजाती लाली में।

32

आती याद रँभाती गायें

खोमरी वाले ग्वालों की

रोपण करतीं ग्राम बधूटी

गातीं गीत, सुतालों की।
9

33

सजे सजाये धान खेत के

हरे भरे अनमोल की

बिरहा गाते ‘बिरझू‘ ‘रामा‘

बजते न्यारे ढोल कीं।

34

आते याद किसान डोलते

हल बैलो सँग खेत में

कृष-काया जिनकी सन जाती

मिट्टी कीचड़ रेत में।

35

बहर की झाँई का जिनके

मन में असर न लेष है

करूणा, दया, त्याग, तप संबल

राम राज का देष है।

36

कहते लोग स्वराज्य हो गया

खुषहाली है देष में

कोई जाकर आज देखे लें

ग्रामों के परिवेष में।
10

37

आती याद झुलती ललना

हर कदंब को डार में

कजरी गातीं मधु बरसाती

धरती झूमी प्यार में।

38

‘करम डार‘ ‘बैगा‘ को गड़ती

फिर मुखिया के द्वार में

झूम झूम सब करमा गाते

‘माँदर‘ की धिनकार में।

39

श्वेत बसन काँसे के धर कर

पृथ्वी सजती क्वाँर में

खेतों में फसलें लहरातीं

चढ़ी जवानी ज्वार में।

40

शरद् चंद्रिका दूध बाँटती

खेत खेत के कोने में

बलें झूम झूम कर पोंती

बैठी हरित बिछौने में।
11

41

आँख मिचैनी सूरज करता

कभी धूप बरसात में

बारि बूँद मोती बन ढलती

कमलनाल के पात में।

42

आती याद निरभ्र रात्रि में

बैठक चाँद सितारों की

राजताल पर खिले कुमुद की

चातकि की ललकारों की।

43

‘हारिल‘ ‘सुग्गे‘ ‘मोर‘ खेत में

बैठी छिपी जमात में

बालों के झूमक उतारने

आते मिल जुल प्रात में।

44

सर्दी ले सिहरन जब आती

गली गली हर पात में

बन बाराह मचाते ऊधम

फसल चाटले रात में।
12

45

तभी किसान गाढ़ कर माचा

खेत खेत के कोनक में

फोड़ फटाके उन्हें भगाते

बैठ पुवाल-बिछौने में।

46

नीचे जलती आग रात भर

ऊपर नील बितान था

बिना वस्त्र के ठठरीवाला

जाग रहा इंसान था।

47

रंग पा लिया बालों ने अब

फसल पकी है खेत में

गुलदस्ते सी सजीं बयारियाँ

लाल ष्याम रंग खेत में

48

याद आ रही है फसल काटती

ललनाओं की टोलियाँ

‘बहरी‘ को ‘काँसे‘ बटोरती

‘सीला‘ बिनती झोलियाँ।
13

49

थे कपसीले मेघ तैरते

नभ के नीले सागर मंे

शरद्-चंद्रिका सुरा ढालती

भरी किरन की गागर में।

50

दीप मालिका सजती घर-घर

लगते वंदनवार थे

खलिहानों में लक्ष्मी आतीं

भर जाते भंडार थे।

51

रजनीगंधा खड़ी बाग में

फूली उर के माँझ थी

प्रिमल परस सुगंध छेड़ता

सिसकी भरती साँझ थी।

52

सुरभित सुमन भरे जुड़े में

हरित पात के गात में

बनदेवों अठखेली करतीं

चंदा के संग रात में।
14

53

रजनी का स्यामांचल भरता

चकई रोती रात में

ओस बिंदु के मिस दे देती

सूरज को हर प्रात में।

54

हल्की चादर हिम की ओढ़े

खेत और खलिहान थे

चैती फसल बो रहे सुन्दर

उत्तम कृषक सुजान थे।

55

चना, जवा रमतिल्ला सरसों

गेहूँ और केराव से

राई धनिया आलू के फिर

बीज डालते चाव से।

56

याद आ रहीं घर-घर फिरती।

माहिलाओं की टोलियाँ

‘सुग्गा‘ गा गा अन्न माँगतीं

भरती अपनी झोलियाँ।
15

57

लो अतीत का अन्त छुपाये

आषा का संचार था

नये वर्ष की खुषियाँ लाता

‘छेरता‘ का त्यौहार था।

58

शारदीय बाला सोतो थी

प्रकृति-नटी की गोद में

चाँद किरन कर सहलाता

अलके उसको मोद में।

59

सम्मोहन सा कौन किये था

घनी मूच्र्छना छाई थी

ज्ल थल नभ से मंडित था

नीरवता की झाँई थी।

60

आती याद विहंगावलियाँ

समुद्र बिहरती व्योम में

कलरव से जिनके भर जाता

नवल हर्ष प्रति रोम में।
16

61

याद आ रहीं ‘हसदो‘ तट की

झड़बेरों की डालियाँ

जिनसे बेर तोड़ हम खाते

समुद्र बजात तालियाँ।

62

याद आ रहीं खरगाषों की

लुक छिप करती टोलियाँ

जिन्हें पकड़कर हम झुरमुट में

करते हँसी ठठोलियाँ।

63

द्वार खड़ा हेमंत गिराये

पातों का परिधान निराष

बिरह विदग्धा प्रोषित पतिका

सी बन कन्या खड़ी उदास।

64

याद आ रहे हिम से मंडित

धवल श्रृंग शीतल अतिकांत

बिरहिन की ज्वाला धधकाते

करते उर को अधिक अषांत।
17

65

हिम आयुध हेमंत वीर ले

दृढ़ कर बज्र पवन के बाण

धरती पर वर्षण करता नत

हिल जाते जन के प्राण।

66

प््राात कुँहासा घनीभूत हो

ढँक लेता था खेत कगार

जिससे सूरज देख न पाये

ग्रामीणों का कष्ट अपार।

67

अरूण कोपलें तरू पर लसतीं

सर्जन का ले नवल बिहान

कोमल करके मृदु इंगन से

करती थीं बसंत आहृान।

68

कंचन की साड़ी में भरती

सरसों के फूलों का रात

भँवरे के गुन-गुन में सुनती

ऋतु बसंत आगम की बात।
18

69

आते हैं ऋतुराज अंक में-

भर लेने को ही तैयार

खोल पाँखुरी के कर सर सिज

मनो ऊपर रहा निहार।

70

आम्र -मंजरी मुकुट शीषधर

मलय वायु के रथ आरूढ़

कुसुमायुध कोकिल के स्वर में

कहते अपनी कथा निगुढ़।

71

फूल फूल में जाकर भँवरा

मस्ती से करता मधुपान

उधर कोकिला कामनियों पर

मार रही थी पंचम वाण।

72

बिरहिन निषि में नित्य बनाती

कंचन के शुचि सौध अनन्त

जो प्रभात आते ही ढहते

सेज न आते निष्ठुर कंत।
19

73

शीतल मंद सुगंध अंक भर

बहता रहता पवन अधीर

बिद्ध-हृदय कर कामिनियों का

कर देता कटाक्ष गंभीर।

74

नव उपत्यका बहु बनी थी

पातों के घूँघट को साज

तितली रानी रंग पा रही

फूलों की डाली में आज।

75

भ्रमर-मेघ गुंजन बरसाते

बिरहिन कलियों के मुखद्वार

कह करके संदेष यक्ष का

लूट रहे मधु का संसार।

76

सरसों के फूलों से होते

धरा बधु के पीले हाथ

टेसु भरता माँग सजीली

चंपा की कलियों के साथ।
20

77

याद आ रहा अर्ध ध्वस्त

अति जोर्ण महल मनहूष उदास

पिसी हुईमानवता जिसकी

ईटों का करती उपास।

78

जिसके गुबंद नृप नृषंष के

अहंकार से होकर चूर

भूलुंठित हो सिसकी भरते

नत मस्तक मंडित थी धूर।

79

जिनके वक्ष बैठ इठलाती

निर्ममता की सूखी घास

जिसकी यषः कथा कह रोते

उल्लू चमगादड़ से दास।
80

थी प्राचीर निराष नायिका-
खंडित खुले नयन के द्वार
जैसे उद्यत नव बसंत ने
लूट लिया उसका श्रृंगार।
21

81

ताल चितेरा लिये तूलिका

लेता नभ के चित्र उतार

उधर इंदु करने लगता था

कुमुदावलियों से अभिसार।

82

पंच बाण निष्प्रभ होता लख

होकर क्रुद्ध अनंग अपार

लगे मारने बिरही जन पर

कामिनियों की तेज कटार।

83

आतीं याद रूपसी जातीं

पनघट को गागर धर शीष

जिनकी चाल रसिक मन धन में

सौदामिनि बन करती टीस।
22

84

वन्य सुमन सुरभित सुरंग भर

मलय पवन पिचकारी में

रति के साथ अनंग खेलते

फाग समुद्र हर क्यारी में।

85
बन बन बाग बाग बीथी में

बस ऋतुराज सैन्य के संग

बिरहिनि का उर-पुर झुलसाते

कामिनियों का कर मद भंग।

86

ताराओं की सेज सजा कर

रख कर इंदु दीप गृह द्वार

रजनी सदा सुहागिन करती

नव बसंत प्रिय से मनुहार।

87

‘कटई‘ के तरू याद आरहे

‘तेंदु‘ मधुर सुघर फल ‘चार‘

जिन्हें तोड़ने हम जाते थे

‘मेंड्रा‘ पर्वत के उस पार।

 

 

23

88

याद आ रहे झुँइहारों के

‘मोरे‘ ‘टोकने‘ तीर कमान

जिनमें ‘कंदर‘ ‘खुखड़ी‘ भरते

खोद जड़ी बूटी मतिमान।

89

अब तक अन्न न रहता रंचक

जीता था इनसे इंसान

वन-पषु बध करने में इनका

संगी होता तीर कमान।

90

नव करीर का साग सलोना

‘ढुरू कंदा‘ भात था

हरी घास की रोटी खाते

तपे लौह सा गात था।

91

कौरव और पांडु के बंषज

देख तुम्हारी व्यथा अपार

कौन कहो पाषाण हृदय जो

रोके नयनों की जलधार।
24
92

बना चटाई दौरी टुकना

‘टिड़गु‘ जाते दौड़ बजार

‘बीजा तरिहा‘ बाँस काट कर

सींक बनाते गाँव मँझार।
93

आज भले श्री ने छोड़ा हो

अर्जुन से बलषील उदार

लक्ष्य-भेद करने में अब भी

क्या कोई पाता है पार।
94

आती याद आज ‘मँझिला‘ की

जो सूपा को ‘घोंस‘ अपार

सभी रोग सब के हर लेते

औषधि बिना किये उपचार।

25
95

‘बूटू‘ बैद्य विषम ज्वर हरते

छे जडि़यों का क्वाथ अमोल

‘निम्ब‘ ‘गुरिच‘ का मिश्रण करके

देते फिर काढ़े का घोल।

96

‘बड़ा कंद‘ की कह प्रषस्ति फिर

ल्ेते उसको तुरत उबाल

ज्वर ढलने पर रूण व्यक्ति को

देकर भरते शक्ति विषाल।

97

भुँइहारिन थी ‘लाख‘ लगाती

‘बागा‘ बाँधे षिषु अनजान

उधर मारते मछली ‘पंडो‘

कर ‘बंषी‘ ले परम सुजान।
26
98

बन बन फिरते गाँव गाँव के

पंडो युवा सुवति मन चंग

छत्ते तोड़ समुद्र खाते थे

रोटी मधुर शहद के संग।

99

फल से लदे आम्र-तरूओं की

झुक जाती थी यों डाली

मनों कोई अति कुलीन नर

डपकृत दिखता बलषाली।

100

भरी दुपहरी के अंचल को

चंचल पवनरहा झकझोर

लिये बालको की टोली हम

चल देते बागों की ओर।
27
101

‘खिरसा‘ ‘तोप‘ ‘सिंदुरिया‘ ‘धुरिया‘

सुन्दर सुरस रसाल की।

याद आ रही केडि़या तरू की

लदी फलों से डाल की।

102

च्क्रवात फिर धूल उड़ाता

छू लेता धरती आकाष

जैसे किसी सुजन का यष ढँक

द्रोही कुटिल करे उपहास।

103

क्ंत मिलन को जाती रूपा

जैसे लुक छिप निपट अजान।

श्रान्त किन्तु मृदु मंथर गति से

बहता रहता था पवमान।
28
104

धर अबीर सी धूल धरा फिर

मलय पवन कर सुरभित अंग

नभ से फाग खेलती भरता-

फूलों की साड़ी में रंग।

105

कोयल ढोल बजा कर गाती

निषि दिन छिपी आम के पात

धरा प्रात में रंग डाल कर

भर देती प्राची के गात।

106

हिन्दु, मुस्लिम, सिक्ख, इसाई

भेद भाव तज मिल कर संग

धूल उड़ाते, होली गाते

रंग डालते छनती भंग।
29
107

जहाँ न छल की छाया पलती

राग द्वेष रहता था दूर

तन की यमुना का मन गंगा-

से संगम होता भरपूर।

108

श्याम गात था मन कंचन-सा

जिनका दीप्त समुज्वल पूत

नहीं नगर की कृत्रिमता थी

मनुज नहीं था वहाँ अछूत।

109

दादू काका चमरू दादा

कुंजा मामा से अनजान

रिष्ते जुड़े सभी से होते

त्याग बर्ण कुल का व्यवधान।
30
110

प्रौढ़ा सी गेंहूँ की बालें

झूम चैत्र में कर श्रृंगार

पीत ओढ़नी में भरती थीं

मुक्त पवन का मुजूल प्यार।

111

खड़े चने के बिरवे छौने

बूटों से लद सघन उदार

बिकट बानरी सेना जिसमें

लुक छिप करती समुद बिहार।

112

जौ अपनी सुतीक्ष्ण बालों में

भरे अन्न का मृदु भंडार।

जैसे अनुषासन प्रिय गुरू के

उर में होता नेह अपार।
31
113

शाल धरा की गोदी में फिर

भरते सुरभित सुमन अपार

‘कटई‘ ‘चार‘‘ आँवला ‘तेंदु‘

फल से लद करते अभिसार।

114

अमलताष की ले मषाल फिर

मंद पवन के झोंकों में

प्रकृति नटी मंगल गाती थी

पात-पात की नोंकों में।

115

थ्लये जवारा बजते बाजे

प््रमुदित होता था संसार

आती राम जन्म की बेला

नवमीं का होता त्यौहार।
32
116

पीतांबर धर लिये कलष सिर

समुद शोंड़गी कर भ्ृंगार

उमहाती निज स्वर लहरी से

अमित हर्ष का पारावार।

117

चुभा त्रिषुल बाहुओं में फिर

बिद्ध किये जिहृाग्र उदार

लौह दंड से पृष्ठ भाग पर

करने लगते बज्र-प्रहार।

118

देख शक्ति का रूप भयावह

कंपित होता था संसार

श्रद्धा भक्ति सहज जग जाती

आस्तिकता के खुलते द्वार।
33
119

शंख मृदंग ढोल के स्व्र से

ग्ुंजित वन प्रान्तर के छोर

पुष्प रेवड़ी दुग्ध बताषे

बरसाते सब उनकी ओर।

120

लिये अंक में षिषुओं को फिर

महिलाओं की भीड़ अपार

डाल चरण में करैं मनौती

लेतीं समुद भस्मि को धार।

121

नव गीतों की स्वर लहरी में

मधुर अमिय रस देती घोल

नव किषोंरियाँ खेत काट कर

ढेर कर रहीं अन्न अमोल।
34
122

च्ना जवा गेहूँ के लगते

गेह-गेह पर ढेर अपार

द्विरागमन लक्ष्मी का होता

भर जाते कृषकों के द्वार।

123

उधर चाँद मोती बटोर कर

भर देता रजनी की गोद।

बैल जोडि़याँ फँदने लगतीं

अन्न मीसते कृषक समोद।

124

बंशी वट बन प्रान्तर बनतें

सरिता कूल कलिंदी ठौर

ग्वाल-बाल कान्हा बनते थे

गोपी ग्राम-वधु सिरमौर।
35
125

मन वृन्दावन पावन बनता

सजते भावों के हिंडोल

मुग्ध-मृगी-सी चकित राधिका

सुनती थी बंषी के बोल।
126

उधर ब्याह ररचने को उत्सुक

ग्राम-ग्राम के कृषक कुमार

भरी बैल गाड़ी अनाज की

ले जाते थे समुद बजार।

127

ज्हाँ मूल द्विगुणित बन लगता

पुनः चक्रवृद्धि की मार

ले उधार अग्रिम फसलों पर

कृषक लौटता था मन मार।

36
128

उर सुना, गाड़ी थी सूनी

सूना हुआ सभी संसार

मन सूना, आषा भ्ज्ञी सूनी

सूने हुये सभी आगार।

129

श्रम का मूल्य आँक सकता क्या

शोषण ही जिसका आधार

हित साधन वह छली करेगा?-

जो हरता दे कंठ कुठार।

130

आते याद ‘डहर चतरौनी‘

करने वाले चतुर किसान

जो कन्या की ‘मँगनी‘ करने

जाते बन कर निपट अजान।
37

131

रहते सभी बधू के घर मेें

यदि श्रृगाल रहता निषि मौन

कहते प्रात डगर हम भूले

‘घर है कहाँ‘ ‘दिषा है कौन‘।
132

यदि कन्या के पिता समझते

घर बर ग्राम सभी अनुकूल

क्हते ‘घर यह‘ ‘यही दिषा है‘

कुछ भी नहीं तात प्रतिकूल।

133

बस इतना संकेत मिला फिर

हो जाती थी पूरी बात

दो अबोध दिग्भ्रान्त प्राणके

प्रणय-सूत्र का होता प्रात।
38
134

पुनः ‘तिहारी‘ ‘मन बरोखियाँ‘

करता वर का पक्ष उदार

देकर अन्न वस्त्र मंजूषा

भर देता कन्या के द्वार।

135

‘लगन गैंठ‘ फिर कन्या वाले

जकर देते वर के द्वार।

पते थे सम्मान अमित तब

खुलती लगन समुद परिवार।

136

फिर शहनाई बज उठती थी

द्वार-द्वार पर वंदनवार

धन श्री गई, गेह की श्री भी

अब जाने को है तैयार।
39
137

फिर मंडप गड़ते ‘सरई‘ के

बर कन्या के सजते द्वार

हन्दी को अरगजा लेप कर

करतीं बहन बधू श्रृंगार।

138

पीले अंग पीत वसनों में

रति सी सजी नवेली नार

प्रिय अनंग पति के स्वागत को

मानो बैठी हो तैयार।

139

हृदय-सिंधु में उठने लगते

सुखद भाव के मधुमय ज्वार

चन्द्र-बधू का मुख-मंडल बन

अवगुंठन से रहा निहार।
40
140

फिर मँझवा के दिन सगोत्र सब

करते पूजा ‘पितर‘ उदार

पाते भोज बरात सजाते

जाते थे कन्या के द्वार।

141

क्रते फिर बारात ‘परघनी‘

कन्या के बांधव अरू ीमत

क्षिति के अंक सुहागिन भरतीं-

सरस सुधामय मंजुल गीत।

142

बर मंडप को छूने जाता

सुमुखि रोंकतीं चतुर अपार

वह दुर्बल यदि छू न सके तो

हो जाती थी उसकी हार।
41
143

फिर भाजी खाने का न्योता

जाता वर कन्या के द्वार

जहाँ सालियाँ उसे बनातीं

बेचारा रहता मन मार।

144

बड़ा देव की पूजा होती

फिर बैगा देता ललकार

जुड़े बराती और घराती

कन्या आती मड़व मँझार।

145

‘गोड़ धोनी‘ फिर करते बांधव

छेते लोटा थाल परात

अन्न वस्त्र आभरण मधुर फल-

की ढेरी लगती उस रात।
42
146

कंचन के अमोल तारक ले

भरता गगन निषा की गोद

यहाँ बधू की ओली भरतीं

मतृ पक्ष की सखी समोद।

147

मंगल गीत बीच विहगों के

प्रात उषा की भरता माँग

यहाँ बधू सिंदूर पा गई

होता पूर्ण व्याह का स्वाँग

148

कहलाते हम सभ्य अहो पर

कन्यायें हैं हम को भार

‘तिलक‘ न लगता यहाँ बधू का

बर उल्टा भरता आगार।
43
149
कितना है आदर्ष ब्याह यह

कितना सुखी ग्राम परिवार

जहाँ बधू लक्ष्मी बन रहती

पिता न खाता धन की मार।

150

छत्तिस गढ़ी सरगुजा वासी

कहकर जो करते अपमान

सीख सकें तो हमसे सीखें

ब्याहों का आदर्ष महान्।

151

मंगल वाद्य पुनः बज उठते

डोले में दंपति असवार

लगती झड़ी आसुँओं की फिर

छूटा कन्या का परिवार।

44
152

होकर बिदा बरात बधू संग

पहुँच गई जब वर के द्वार

चमकी चपला अमित हर्ष की

बरसी नेह मेह की धार।

153

वर कन्या मंडप में आते

‘माँदी‘ बैठी अहो समोद

‘गोड़धोई‘ कर सखा स्वजन सब

अन्न वस्त्र दे करैं बिनेद।

154

पुनः वधू जा कलष छिपाती

किसी जलाषय के उस पार

जिसे ढूँढ कर वर लाता था

भर कर मन में मोद अपार।
45
155

बेणी खोल वधू की देता

वर निज कर से कुषल महान्

खोल षिखा अपने प्रियतम के

वधू काँपती निपट अजान।

156

उस दिन वधू स्वयं ही रचती

व्यंजन अमित मधुर पकवान

सखा, स्वजन, परिवार, पड़ोसी

खाकर करते थे गुणगान।

157

कोयल कुहू कुहू कर बैरिन

भरती बिरहिन के उर शूल

मिलन यामिनी में दंपति द्वय

आ समीप बरसाते फूल।
46
158

लिये एक कर में लकुटी अरू

उत्तरीय स्कंद विषाल

ष्वेत वस्त्र धर मामा फूफा

ले जाते ‘चउथा‘ तत्काल।

159

फिर आती निज गेह बधू औ

वहाँ समुद रह दिन दो चार

जाती लौट पुनः वर के घर

‘पियरी धोती‘ कर जेवनार।

160

पियरी धुली हुआ मन कंचन

छूटा मायक औ‘ परिवार

बेणी खुली षिखा के बंधन

बसा आज से नव संसार।
47
161

जहाँ छिपा गौरव अतीत का

लख नगरों का कृत्रिम रूप

राग द्वेष ईर्षा मत्सर की

जहाँ न लगती जलती धूप।

162

ज्हाँ सत्य की शुचि गंगा में

अवगाहन कर ग्राम समाज

मिथ्या कोह द्रोह के पंकिल

से लोहा लेता है आज।

163

क्यों होंगे विवाद घर-घर में

एक सूत्र में बँधा समाज

क्यों फिर न्याय मंच कार्यालय

बैरिस्टर वकील बेकाज।
48
164

यदि विवाद उठ ही जाता तो

बैठ ग्राम के बृद्ध सुजान

सुनकर उभय पक्ष की बातें

तुरत बताते सुगम निदान।

165

होते यदि अपराध अनैतिक

यहाँ दंड का कड़ा विधान

निष्कासित कर उसे जाति से

तज देते थे भोजन पान।

166

भोजन खान पान सब छूटा

छूटा ब्याह जाति परिवार

पुनः पर्व उत्सव में कोई

उसे न लाता अपने द्वार।
49
167

किन्तु कठोर दंड की परिणति

प्रायष्चित बन आत्मोद्धार

यदि समाज के सम्मुख आती

उसे मिलाते जाति मँझार।

168

करते ‘भात‘ सभी मिल खाते

स्वजन वृद्ध आबाल उदार

जिन्हें परोस स्वकर से दंडित

होता प्रणत विनय के भार।

169

आत्मसात कर सकी न संस्कृति

फिसले जिनके किंचित पाँव

आज इसी से विश्रृंखल सब

और धर्म की डगमग नाव।
50
170

अरे धर्म के ठेकेदारो

बृथा दंभ की यह हुँकार

बना सको तो हृदय बना लो

इनका जैसा तनिक उदार।

171

यहाँ प्रेम पलता है निष्छल

भ्रातृ भाव का है संचार

बनी सभी की मर्यादायें

जिनमें बँधा ग्राम-परिवार।

172

यहाँ न धन का-मूल्य प्रेम का

सज्जन सुहृद हाँथ पतवार

भाई की गर्दन पर भाई

मिलकर कभी न करता वार।
51
173

यहाँ अन्य के धन वैभव पर

करता कभी न कोई धात।

लेता यदि ऋण उसे ब्याज संग

लौटाता है उसको प्रात।

174

जहाँ आज संभ्रान्त कुलों में

है वैधव्य व्यथा का भार

नहीं समस्या हमको दहती

‘बँदवा‘ का चलता व्यौहार।

175

हम ईमान न विक्रय करते

करें न हम इज्जत पर वार

पर निंदा को व्यर्थ समझ कर

देते सब को मृदु व्यवहार।
52
176

हम मिट्टी से स्वर्ण बनाते

रखते निज श्रम पर विष्वास

हम न किसी का हरण करें धन

यह विडंबना क्यों उपहास।

177

हम समाज वादी हैं सचमुच

वर्ण व्यवस्था है आधार

यहाँ कर्म से बन जाते हैं

178

श्रम का मूल्य धान्य से अंकित

म्ुद्रा का है न्यून प्रसार

यहाँ अन्न के बदले लेते

मिर्च मसाले वस्त्र अपार।
53
179

हम गाँधी के वरद-पुत्र हैं

करते माँ का उत्थित भाल

हम स्वदेष के भाग्य विधात

हम में रमे जवाहर लाल।

180

देश रत्न राजेन्द्र हमीं हैं

भगत सिंह हम तिलक महान्

जय जवान जय जय किसान कह

देष हमें देता सम्मान।

181

प्रेम ब्याह रचने को सुन लो

बनते आज विषिष्ट विधान

हम ‘सिंदूर घोंस‘ कन्या के

बधू बनाते भले अजान।
54
182

इस प्रकार के ब्याहों से जो

संतति होती है अनजान

जाति पिता की देकर उसका

करते हम समुचित सम्मान।

183

हीन न कहते उसे जाति में

खान पान में मृदु व्यवहार

पुत्र हुआ तो स्वयं पिता के

पाता वह उत्तर अधिकार।

184

त्याग तपस्या कर्मयोग औ

स्दसचार पर कर विष्वास

द्रोह मोह पाखंड वाद को

कभी न देते आने पास।
55
185

चित्रकूट यही वनस्थल

पर्णकुटी हैं ये घर द्वार

जहाँ बिमल उर की मंदाकिनि-

तट पर बसते राम उदार।

186

सत्य अहिंसा यहाँ धर्म है

यहीं रमा का रम्य निवास

अर्थ, धर्म कामादि मोक्षफल

चार धाम मिल करते वास।

187

ये अतीत केगर्व हमारे

चिर संस्कृति की लिये मषाल

देते हैं प्रकाष वसुधा को

ये लघुता में बने विषाल।
56
188

बीत गया बैसाख अर्ध

लो बोना है अब ‘भूरा धान‘

मना ‘कठौरी‘ हुई पुजौती

चले खेत को कृषक सुजान।

189

दिग दिंगत के उर भुलसाता

लिये पवन-कर पावक बाण

वन्य प्राणियों को अब देते

सभी जलाषय किंचित त्राण।

190

हर ध्वनि उठ पड़ी वनों में

कंपित जड़ चेतन के प्राण

तप्त दुपहरी चली लूक फिर

हुये अचर चर सब म्रियमाण।
57
191

कुसुमायुध पर हो प्रकुप्त क्या

चंद्रमौलि ने दिया निहार

नयन तीसरा खुलते ही जो

ज्वलित हुआ सारा संसार।

192

अरे ज्येष्ठ की दोपहरी या

क्रुद्ध इंद्र का बज्रघात

चलती दिन में लूक भयावह

नित्य निषा में उल्कापात।

193

चक्रवात या महाकाल का

है तांडव ऐसा विकराल

धूर्मित दिग दिंगत के प्रांगण

प्रकृति नटी का कैसा जाल।
58
194

कौन कर्मयोगी ऐसा जो

लेकर प्राण स्वकर में आज

हल बैलों संग खेत जोतता

बोता अन्न छोड़ सब काज।

195

तप्त गगन धरती समीर सब

पद-त्राण बिन जलते गात

श्वेद विंदु के झरनों से ही

होते तुम सद्यः स्नात।

196

लगी प्यास ‘ढोढ़ी‘ समीप जो

पी पानी पातों के पात्र

चलते फिर नागर के सँग सँग

तपी धूप पर शीतल गात्र।
59
197

‘झुराधान‘ बो गया आया

‘गंग दषहरे‘ का त्योहार

शुभ्र-वस्त्र आभरण अलंकृत

ग्राम्य सुन्दरी है तैयार।

198

ग्राम ग्राम के नव कुमार सब

सज बज कर झतरी को धार

गाते गीत समुद चल देते

जहाँ एकत्रित भीड़ अपार।

199

टोली बनी नारियों की फिर

होती गीतों की बौछार

डाल गले मंे हाथ परस्पर

गीतोत्तर दें कृषक कुमार।
60
200

यहीं सूत्र है नये प्रेम का

नये प्रणय के खुलते द्वार

शुभ संस्कृति का चरम यहीं है

यहीं आदि का उपसंहार।

201

कैसे तुम्हें भूल सकते हम,

महतों सुन्दर भइयालाल

जो मुझको ले गोद अंकभर-

देते सुन्दर सुरस रसाल।

202

उर उपत्यका में रोपण कर

राजनीति का विटप विषाल

वरद हस्त दे जिनने मेरा

आज कराया उत्थित भाल।
61
203

सज्जन सुकृत सिंधु से मन के

पूर्ण इंदु जो आज महान्

तपोनिष्ठ उस महती को क्या

दे सकता हूँ मै प्रतिदिन ?

204

आतीं हृदय पटल पर सुधियाँ

झुक जाता मस्तक साभार

‘चैतू‘ ‘आगार‘ सायकंध ले

मुझे डुलाते देकर प्यार।

205

जिनने जड़त-तिमिर दूर कर

दिया ज्ञान का रवि भरपूर

मन अलिंद क्या पद पंकज से

क्षण भर भी रह सकतादूर।
62
206

जिनने सदा सहोदर से बढ़

मुझे बिपद में अपनाया

मुझ ससीम को लघुता में भी

भेंट हृदय से लिपटाया।

207

कहो बंधु सा कौन महत्तम

कहो कौन जगती तल में

देकर जिसने लिया न कुछ भी

अहो भाग्य मैं प्रतिपल में,

208

जीवन के झंझावातों से

जब जब होती डगमग नाँव

भ्रुज विषाल का प्रश्रय देकर

जो देते थे शीतल छाँव।
63
209

कौन सखा अरू सुहन्मित्र है

सरल उदार मनरवी धीर

ग्राम्य जनों को कैसे भूलें

जिनसे ममता है गंभीर।

 

 

 

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