नींद चली आती है…


बाँट में,
अपने हिस्से का सब छोड़,
कोने में पड़ी
सूत से बुनी वह
मंजी अपने साथ ले आई,
जो पुरानी, फालतू समझ
फेंकने के इरादे से
वहाँ रखी थी ।

बेरंग चारपाई को उठाते
बेबकूफ़ लगी थी मैं,
आँगन में पड़ी
बचपन और जवानी का
पालना थी वह।

नेत्रहीन मौसी ने
कितने प्यार से
सूत काता, अटेरा औ’
चौखटे को बुना था,
टोह – टोह कर रंगदार सूत
नमूनों में डाला था ।

चौखटे को कसकर जब
चारपाई बनी
तो हम बच्चे सब से
पहले उस पर कूदे थे।

उसी चारपाई पर मौसी संग
सटकर सोते थे,
सोने से पहले कहानियाँ सुनते
और तारों भरे आकाश में,
मौसी के इशारे पर
सप्त ऋषि और आकाश गंगा ढूँढते थे।

और फिर अन्दर धँसी
मौसी की बंद आँखों में देखते…
मौसी को दिखता है ….
तभी तो तारों की पहचान है।

हमारी मासूमियत पर वे हँस देतीं
और करवट बदल कर सो जातीं,
चन्दन की खुशबू वाले

उसके बदन पर टाँगें रखते ही
हम नींद के आगोश में लुढ़क जाते।

चारपाई के फीके पड़े रंग
समय के धोबी पटकों से
मौसी के चेहरे पर आईं
झुरियाँ -सी लगते हैं।

जीवन की आपाधापी से
भाग जब भी उस

चारपाई पर लेटती हूँ,
तो मौसी का
बदन बन वह
मनुहार और दुलार देती है।

हाँ चन्दन के साथ अब
बारिश, धूप में पड़े रहने
और त्यागने के दर्द की गंध
भी आती है,
पर उस बदन पर टाँगे
फैलाते ही नींद चली आती है…
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