स्मृतियाँ

स्मृतियाँ

चाँद को देख
आँखें मूँदनी पड़ीं..
..
बिन बुलाए
 बेमौसम
झरती फुहारों सी
स्मृतियाँ
जब उनकी चली आईं….

अश्रुओं की धार बहाती
हृदय व्यथित करती
इच्छाओं को
तरंगित करती
स्मृतियाँ 
उनकी चली आईं?

छुआ तो 
उन्होंने दिल को है….
पर होंठ बोल उठे,
लोगों की उँगलियाँ उठीं….
चाँदनी भी
चाँद के पहलू में छिप गई
स्मृतियाँ 
जब उनकी चली आईं.

….

इस आशा पर कट रही हैं
स्याह रातें,
बहारें लुटाती
 आएँगी
भोर की किरणें,
मिटा देंगी उनकी 
स्मृतियाँ,
मुँह उठाए जो चली आईं.
……
-0-

 

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