कठपुतली

कठपुतली हैं उसके हाथों की

फिर नाज़ -नख़रा कैसा ?
नाचो जैसे नचाता है
वह आका है तुम्हारा…….

धागें हैं उसके हाथों में,
कभी कत्थक,
कभी कथकली,
कभी ओड़िसी,
कभी नाट्यम
करवाएँ हैं तुम से…….

कराएँ हैं नौ रस भी अभिनीत
जीवन के नाट्य मंच पर,
हँसे या रोएँ
विरोध करें या हों विनीत
नाचना तो होगा ही
धागे वो जो थामें है…….
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One Response

  1. Shiuli Gupta 25/08/2016

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