रिश्ते


तुमने कितनी ज़ल्दी
इस अनाम एहसास को
नाम दे दिया…..
रिश्ते में बाँध  दिया।

सिर्फ़ इतना कहा था,
तुम मेरे दिल के क़रीब हो…
दिल के निकट,
क्या सिर्फ़ रिश्ते होते हैं?
एहसास और वे जज़्बात
जो अंकुरित हुए ही थे….

जिन्हें पलना था,
बढ़ना था,
पल्लवित और
परिमार्जित होना था,
परवान चढ़ना था,
अपने शैशवकाल में ही
रिश्तों की सूली पर टँग गए।

भावनाएँ–
संवेग–
खुले रहकर भी
मर्यादित रह सकते हैं,
फिर बँधना-बाँधना क्यों ?
शायद तुमने
सामाजिक ज़रूरत समझी होगी….

मैं ऐसा समाज निर्मित करूँगी,
जहाँ औरत सिर्फ़ माँ, बेटी, 
बहन,
पत्नी या प्रेमिका ही नहीं,
एक इन्सान,
सिर्फ़ इन्सान हो…
उसे इसी तरह जाना,
पहचाना और परखा जाए।

 

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