राख हुए जाते हैं……

संग्रह- इन्द्र देव चवरे

(1)  राख हुए जाते हैं

जिसके लिए ही रचे हैं अडम्बर जात,

जिसके लिए ही साज़-बाज सजवाते हैं |

जिसके लिए रत्न-भूषण खरीदे जात,

जिसके  लिए ही भोग भोजन बनाते हैं ||

कहत ‘बिहारी’ इन शरीरन की न पूछो बात,

धोखा देन बारे कोउ काम नही आते हैं |

पाले राख-राख और सम्हाले राख-राख

जिन्हें, साधे राख-राख वो ही राख हुए जाते हैं ||

(2)  आना कौन काम का

ईश्वर दया ही  देत जन्म  नर देह का,  मौका देत  मुक्ती का सहारा देत नाम का |

तो भी नही चेतत अचेत चित्त देत नही, अवसर अनूप नष्ट होत श्रृष्ठि याम का |

कहत बिहारी हरि माया से मनुष्य बना, आया जग बीच मज़ा पाया धन-धाम का |

न पाना हुआ रामका न गाना हुआ राम का, न बाना हुआ राम का तो आना कौन काम का |

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