ज़रूरत क्या है पढ़ने की

रचनाकार-इन्द्र देव चवरे

अच्छा खासा घर-बार है, जिसमें नौकर भरमार हैं |

कॉलेज़ जाने को कार है, और किताबों का अम्बार है |

फ़िर भी     लाडला  हमारा,  पास होने  में  लाचार  है |

क्योंकि हरदम ही मूड उनका, आउट आफ बाज़ार है |

तंग आकर  फ़दर बोले  बेटा,  अब ये  नही  स्कूल है |

रिश्वत देकर  पास होने की,  इच्छा तुम्हारी  भूल है |

‘डीय्रर फादर’ पाठ्य पुस्तक न पढ़ना हमारा उसूल है |

अलमारी हमारी नयी  फ़िल्मों की डी वी डी से फुल है |

ज़रूरत क्या है पढ़ने की, कुल सचिव हमारे अनुकूल है |

 

 

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