जो अंधों में काने निकले

जो अंधों में काने निकले
वो ही राह दिखाने निकले

उजली टोपी सर पर रख के
सच का गला दबाने निकले

चेहरे रोज बदलने वाले
दर्पण को झुठलाने निकले

बातें,सत्य अहिंसा की है
पर,चाकू सिरहाने निकले

जिन्हे भरा हम समझ रहे थे
वो खाली पैमाने निकले

मुश्किल में जो उन्हें पुकारा
उनके बीस बहाने निकले

कल्चर को सुलझाने वाले
रिश्तों को उलझाने निकले

नाले-पतनाले बारिश में
दरिया को धमकाने निकले

माँ की बूढ़ी आँखे बोली
आंसू भी बेगाने निकले

पी. एच. डी. कर के भी देखो
बच्चे गधे उड़ाने निकले

6 Comments

  1. dharmendra sharma 20/02/2013
  2. DINESH PAREEK DINESH PAREEK 20/02/2013
  3. आनंद 20/02/2013
  4. Yashwant Mathur 20/02/2013
  5. ganesh dutt ganesh dutt 21/02/2013
  6. Gangaprasad Bhutra Gangaprasad Bhutra 24/02/2013

Leave a Reply